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Economic Survey 2025-26: खाद नीति में बदलाव की जरूरत, यूरिया के अंधाधुंध इस्तेमाल पर ब्रेक

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में यूरिया की कीमत में हल्की बढ़ोतरी का सुझाव दिया गया है, लेकिन इसके बदले किसानों को प्रति एकड़ सीधी नकद सहायता देने की बात कही गई है। सर्वे के मुताबिक सस्ती यूरिया के कारण क

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Pooja Rai·Correspondent·29 Jan 2026· 4 min read

Economic Survey 2025-26: खाद नीति में बदलाव की जरूरत, यूरिया के अंधाधुंध इस्तेमाल पर ब्रेक

Economic Survey 2025-26: खाद नीति में बदलाव की जरूरत, यूरिया के अंधाधुंध इस्तेमाल पर ब्रेक

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में यूरिया की कीमत में हल्की बढ़ोतरी का सुझाव दिया गया है, लेकिन इसके बदले किसानों को प्रति एकड़ सीधी नकद सहायता देने की बात कही गई है। सर्वे के मुताबिक सस्ती यूरिया के कारण किसान जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे मिट्टी की सेहत खराब हो रही है और पैदावार पर असर पड़ रहा है। सरकार का लक्ष्य खाद के असंतुलित उपयोग को ठीक करना, मिट्टी की गुणवत्ता सुधारना और खेती को लंबे समय में ज्यादा टिकाऊ बनाना है।

नई दिल्ली: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में सरकार ने यूरिया की कीमत को लेकर बड़ा सुझाव दिया है। सर्वे में कहा गया है कि यूरिया के खुदरा दाम में हल्की बढ़ोतरी की जानी चाहिए। अभी यूरिया का दाम मार्च 2018 से 45 किलो की बोरी पर 242 रुपये पर ही स्थिर है।साथ ही, कीमत बढ़ने से किसानों पर पड़ने वाला बोझ सीधे उनके खाते में प्रति एकड़ नकद मदद के रूप में दिया जाए।

सरकार का मानना है कि इससे खाद पर मिलने वाली सब्सिडी को धीरे-धीरे इनपुट सब्सिडी से आय सहायता में बदला जा सकेगा। इसका मकसद पिछले करीब 30 साल से चली आ रही असंतुलित खाद इस्तेमाल की समस्या को ठीक करना है, जिससे मिट्टी खराब हो रही है और फसलों की पैदावार पर असर पड़ रहा है।

यूरिया का ज्यादा इस्तेमाल बना समस्या
आर्थिक सर्वे के मुताबिक, भारत में किसान जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन यानी यूरिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। देश में खाद का एन-पी-के (नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटाश) अनुपात वर्ष 2009-10 में 4:3.2:1 था, जो 2023-24 में बिगड़कर 10.9:4.1:1 हो गया है। जबकि ज्यादातर फसलों और मिट्टी के लिए सही अनुपात करीब 4:2:1 माना जाता है। सस्ती यूरिया की वजह से किसान दूसरी जरूरी खादों की तुलना में इसका ज्यादा उपयोग कर रहे हैं।

मिट्टी और पैदावार पर बुरा असर
सर्वे में बताया गया है कि ज्यादा नाइट्रोजन डालने से मिट्टी की जैविक गुणवत्ता घटती है, जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व खत्म होते हैं और मिट्टी की संरचना कमजोर हो जाती है। इसके साथ ही भूजल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ती है। कई सिंचित इलाकों में हालात ऐसे हो गए हैं कि खाद ज्यादा डालने के बावजूद पैदावार बढ़ नहीं रही, बल्कि कुछ जगहों पर इसमें गिरावट देखी जा रही है।

ये भी पढ़ें - सस्ती होने से यूरिया किसानों की पहली पसंद, बिक्री बढ़ी लेकिन उत्पादन घटा

क्या है नया सुझाव
सरकार का प्रस्ताव है कि यूरिया जैसी खाद की कीमतें धीरे-धीरे उनकी असली जरूरत और लागत के हिसाब से तय की जाएं। इसके साथ ही किसानों को खाद सस्ती देने के बजाय सीधी नकद सहायता दी जाए। जो किसान संतुलित मात्रा में खाद का इस्तेमाल करेंगे, उन्हें इसका फायदा मिलेगा, जबकि ज्यादा यूरिया डालने वालों को संतुलित खाद, मिट्टी जांच, नैनो यूरिया और जैविक खाद की ओर बढ़ने का प्रोत्साहन मिलेगा।

क्षेत्र और फसल के हिसाब से मदद
आर्थिक सर्वे में यह भी कहा गया है कि धान-गेहूं और गन्ना वाले इलाकों में नाइट्रोजन की जरूरत ज्यादा होती है, जबकि दलहन और मोटे अनाज वाले वर्षा आधारित क्षेत्रों में इसकी जरूरत कम रहती है। इसलिए नकद मदद को इलाके और फसल के हिसाब से तय किया जाना चाहिए, ताकि सही किसानों को सही लाभ मिल सके।

डिजिटल सिस्टम से होगा लागू
सरकार का कहना है कि आधार से जुड़ी खाद बिक्री, पीएम-किसान और डिजिटल निगरानी प्रणाली की मदद से यह बदलाव व्यवहारिक और संभव है। पहले इसे कुछ इलाकों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू किया जाएगा और अनुभव के आधार पर बाद में पूरे देश में इसका विस्तार किया जाएगा।सरकार ने साफ किया है कि मकसद खाद की खपत घटाना नहीं है, बल्कि उसे मिट्टी और फसल की जरूरत के मुताबिक सही करना है, ताकि लंबे समय में पैदावार बढ़े और किसानों की लागत कम हो।

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