आज भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब देश अपनी जरूरत का अनाज भी खुद पैदा नहीं कर पाता था। 1960 के दशक में भारत को लाखों टन गेहूं विदेशों से मंगाना पड़ता था और देश में अकाल का खतरा बना रहता था। ऐसे कठिन समय में कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने भारतीय खेती की तस्वीर बदलने का काम किया। यही वजह है कि उन्हें 'भारत की हरित क्रांति का जनक' कहा जाता है।
आजादी के बाद भारत की आबादी तेजी से बढ़ रही थी, लेकिन खेती उतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ रही थी। उस समय विशेषज्ञों का मानना था कि अगर खेती में बड़ा बदलाव नहीं हुआ तो भारत सहित कई एशियाई देशों में भुखमरी फैल सकती है। देश को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए विदेशों से अनाज आयात करना पड़ता था।
नॉर्मन बोरलॉग के साथ मिलकर किया बड़ा काम
1950 के दशक में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) में काम करते समय डॉ. स्वामीनाथन की मुलाकात विश्व प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. नॉर्मन बोरलॉग के काम से हुई। उन्होंने बोरलॉग को भारत आने का निमंत्रण दिया।
दोनों वैज्ञानिकों ने मिलकर ऐसी उच्च उत्पादन वाली गेहूं की किस्में विकसित और अपनाईं, जो ज्यादा दाने देती थीं और जिनकी फसल गिरती भी नहीं थी। इससे भारतीय खेती में नई शुरुआत हुई।
सिर्फ नई किस्में नहीं, किसानों को भी सिखाई नई खेती
डॉ. स्वामीनाथन का मानना था कि केवल नई बीज किस्में तैयार करना काफी नहीं है। उन्होंने किसानों को आधुनिक खेती की तकनीक भी सिखाई।
उन्होंने किसानों को बताया कि अच्छी पैदावार के लिए उन्नत बीजों का इस्तेमाल कैसे करें, संतुलित उर्वरकों का उपयोग कैसे करें, सिंचाई बेहतर तरीके से कैसे करें और आधुनिक खेती अपनाकर उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए।
साल 1965 में उन्होंने उत्तर भारत के हजारों खेतों में प्रदर्शन प्लॉट (डेमो प्लॉट) तैयार कराए। इन खेतों में किसानों को नई गेहूं की किस्मों की खेती करके दिखाई गई।नतीजा चौंकाने वाला था। पहले ही साल कई इलाकों में गेहूं का उत्पादन तीन गुना तक बढ़ गया।इससे किसानों का भरोसा बढ़ा और उन्होंने तेजी से नई तकनीक अपनानी शुरू कर दी।
कुछ ही वर्षों में बदल गई तस्वीर
हरित क्रांति के बाद भारत का गेहूं उत्पादन तेजी से बढ़ा।सिर्फ चार फसल सीजन में देश का गेहूं उत्पादन करीब 1.2 करोड़ टन से बढ़कर 2.3 करोड़ टन पहुंच गया। इसके बाद भारत को बड़े पैमाने पर गेहूं आयात करने की जरूरत काफी हद तक खत्म हो गई।
हरित क्रांति की सफलता के बाद डॉ. स्वामीनाथन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ मिलकर ऐसी कृषि नीतियां बनाने में भी अहम भूमिका निभाई, जिनसे देश लंबे समय तक खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना रहे।
दुनिया भर में मिला सम्मान
भारत ही नहीं, पूरी दुनिया ने उनके काम को सराहा।उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य सम्मेलन (1974) की अध्यक्षता की। इसके अलावा वे कई अंतरराष्ट्रीय कृषि संस्थानों से जुड़े और फिलीपींस स्थित इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI) के महानिदेशक भी रहे।
साल 1987 में उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा कृषि सम्मान World Food Prize दिया गया। वे इस पुरस्कार को पाने वाले दुनिया के पहले व्यक्ति बने। पुरस्कार की राशि से उन्होंने एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (MSSRF) की स्थापना की, जो आज भी किसानों, महिलाओं, जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ खेती पर काम कर रहा है।
विज्ञान का फायदा गांव तक पहुंचाया
डॉ. स्वामीनाथन का मानना था कि विज्ञान तभी सफल है जब उसका फायदा गांव और किसानों तक पहुंचे। इसी सोच के साथ उन्होंने किसानों तक नई तकनीक, इंटरनेट, जैव प्रौद्योगिकी, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ खेती की जानकारी पहुंचाने पर काम किया।
डॉ. स्वामीनाथन को दुनिया भर के विश्वविद्यालयों ने 50 से अधिक मानद डॉक्टरेट प्रदान कीं। वे 30 से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विज्ञान अकादमियों के सदस्य रहे।
उन्हें कई बड़े सम्मान भी मिले, जिनमें वर्ल्ड फूड प्राइज (1987), यूएनईपी ससाकावा पर्यावरण पुरस्कार, यूनेस्को गांधी गोल्ड मेडल, इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार, फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट फोर फ्रीडम्स अवॉर्ड शामिल हैं। TIME Magazine ने उन्हें 20वीं सदी के एशिया के 20 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल किया था।
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने सिर्फ अनाज का उत्पादन नहीं बढ़ाया, बल्कि यह साबित किया कि विज्ञान और किसानों की साझेदारी से देश की सबसे बड़ी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। उनकी सोच आज भी खाद्य सुरक्षा, टिकाऊ खेती और किसानों की समृद्धि के लिए पूरे विश्व में प्रेरणा मानी जाती है।





