खेती में फसल तैयार करने के बाद उसे सही दाम पर बेच पाना किसानों के लिए बड़ी चुनौती होती है। मंडी में कभी भाव अच्छा मिलता है तो कभी लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग किसानों को बाजार के इस जोखिम से काफी हद तक बचाने का काम करती है। इसमें किसान और खरीदार के बीच फसल की बुवाई से पहले ही उसकी किस्म, गुणवत्ता, मात्रा और कीमत या कीमत तय करने का तरीका तय हो जाता है। फसल तैयार होने के बाद किसान उसे तय शर्तों के मुताबिक खरीदार को बेचता है।
गुजरात के गांधीनगर और बनासकांठा में किसान इसी मॉडल के जरिए खरीफ में मूंगफली और सर्दियों में प्रोसेसिंग-ग्रेड आलू की खेती कर रहे हैं। खेती में ड्रिप इरिगेशन, स्प्रिंकलर और Raised Bed जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। कॉन्ट्रैक्ट के तहत पहले से तय खरीदार और बाजार होने की वजह से किसानों को फसल तैयार होने के बाद उसे बेचने की चिंता कम रहती है। सही तकनीक और तय बाजार के साथ कई किसान कम समय में अपनी लागत पर अच्छा रिटर्न हासिल कर रहे हैं।
वहीं, उत्तर प्रदेश के हापुड़ के किसान उदयवीर सिंह भी आलू की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़े हैं। पहले से तय रेट पर फसल बेचने की वजह से उन्हें मंडी में भाव गिरने का उतना जोखिम नहीं रहता। यानी फसल बोने से पहले ही किसान को यह अंदाजा रहता है कि तैयार माल कहां और किन शर्तों पर बिकेगा। यही वजह है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग किसानों के लिए बाजार से जुड़ी खेती का एक विकल्प बन रही है।
हालांकि, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में जुड़ने से पहले किसानों के लिए जरूरी है कि वे कॉन्ट्रैक्ट की सभी शर्तों को अच्छी तरह समझें। फसल की कीमत, गुणवत्ता, खरीद की मात्रा, भुगतान का समय, बीज और अन्य इनपुट कौन देगा और फसल खराब होने की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी, इन बातों को पहले से साफ कर लेना चाहिए। सही खरीदार और पारदर्शी शर्तों के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग किसानों को बाजार की अनिश्चितता कम करने और खेती से बेहतर कमाई का रास्ता दे सकती है।
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