भारत में चॉकलेट और कोको से बने दूसरे उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में आने वाले सालों में देश में कोको की खेती का रकबा बढ़ाने और अच्छी गुणवत्ता वाले पौधे तैयार करने की जरूरत है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में कोको की खेती बढ़ाने की काफी संभावनाएं हैं।
कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के विट्टल में ICAR-CPCRI (Central Plantation Crops Research Institute) की क्षेत्रीय इकाई में सोमवार को ‘Self-reliant Cocoa Sector: A Roadmap for 2047’ विषय पर एक बैठक हुई। इसमें कोको की खेती और उत्पादन बढ़ाने को लेकर चर्चा की गई।
CPCRI के निदेशक केबी हेब्बार ने बताया कि भारत में हर साल करीब 1.1 लाख टन कोको की जरूरत है, जबकि देश में अभी करीब 30 हजार टन ही उत्पादन हो रहा है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कोको की मांग बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि भारत में खेती के लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध है। ऐसे में अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों की मदद से दूसरी उपयुक्त जमीनों पर भी कोको की खेती बढ़ाई जा सकती है। हालांकि, इसके साथ फसल की गुणवत्ता, प्रमाणन और ट्रेसबिलिटी पर भी ध्यान देना जरूरी होगा।
भारत में कोको की खपत दूसरे देशों से कम
CPCRI के पूर्व निदेशक पी. चौडप्पा ने बताया कि भारत में प्रति व्यक्ति कोको की खपत करीब 1 किलो है। वहीं, स्विट्जरलैंड में यह करीब 11.56 किलो, अमेरिका में 9.2 किलो, जर्मनी में 5.4 किलो और ब्रिटेन में करीब 3 किलो है।
उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले कोको उत्पादन वाले कई बड़े क्षेत्रों में बीमारियों का असर पड़ा था, जिससे दुनियाभर में कोको की सप्लाई प्रभावित हुई।
देश के कोको उत्पादन में आंध्र प्रदेश की बड़ी हिस्सेदारी
पी. चौडप्पा के मुताबिक, भारत के कुल कोको उत्पादन का करीब 40 फीसदी हिस्सा आंध्र प्रदेश से आता है। राज्य सरकार भी कोको की खेती का रकबा बढ़ाने पर काम कर रही है। इसके तहत एलुरु जिले में ‘कोको सिटी’ विकसित करने की योजना शुरू की गई है।
उन्होंने कहा कि साल 2040 तक भारत में कोको का उत्पादन बढ़ाकर 2 लाख टन करने का लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिए किसानों को अच्छी गुणवत्ता वाले पौधे उपलब्ध कराना सबसे जरूरी है।
800 से बढ़ाकर 1,500 किलो प्रति हेक्टेयर उत्पादन का लक्ष्य
ICAR के पूर्व उप महानिदेशक एनके कृष्ण कुमार ने कहा कि आंध्र प्रदेश के पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी में पैदा होने वाला कोको गुणवत्ता के मामले में सूडान के कोको के बराबर है। उन्होंने कहा कि अफ्रीका में कोको की सप्लाई प्रभावित होने के बीच भारत के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग पूरी करने का अच्छा मौका है।
वहीं, Directorate of Cashewnut and Cocoa Development की निदेशक फेमिना ने कहा कि कोको की खेती के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों की उपलब्धता बढ़ाने के साथ उन क्षेत्रों की पहचान भी करनी होगी, जहां कोको की खेती बेहतर तरीके से हो सकती है। उन्होंने कोको की औसत उपज को करीब 800 किलो से बढ़ाकर 1,500 किलो प्रति हेक्टेयर करने की जरूरत बताई।
KVK किसानों तक पहुंचा सकते हैं नई तकनीक
ICAR-ATARI, बेंगलुरु के निदेशक एम. प्रभाकर ने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) कोको की खेती का रकबा बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश में कोको की खेती का क्षेत्र बढ़ा है, जबकि दूसरे राज्यों में किसानों तक सही जानकारी और तकनीक पहुंचाने की जरूरत है।
ICAR के सहायक महानिदेशक (Plantation Crops) वीबी पटेल ने भी अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने CPCRI से कोको की अच्छी नर्सरी तैयार करने के लिए Good Nursery Practices पर एक मैनुअल तैयार करने का सुझाव दिया।
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