देश में हर साल यूरिया की मांग बढ़ रही है, जबकि घरेलू उत्पादन अभी भी जरूरत से कम है। ऐसे में संसद की रसायन एवं उर्वरक संबंधी स्थायी समिति ने सरकार से कहा है कि नए कारखाने लगाने के साथ-साथ लंबे समय से बंद पड़े दुर्गापुर, हल्दिया और कोरबा के यूरिया कारखानों को दोबारा शुरू करने की संभावना भी गंभीरता से जांची जाए। समिति का मानना है कि अगर ये पुराने कारखाने फिर से चालू किए जा सकते हैं, तो इससे देश की आयात पर निर्भरता कम होगी और किसानों को समय पर यूरिया उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
देश में उत्पादन से ज्यादा है यूरिया की खपत
समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में भारत में 307 लाख टन यूरिया का उत्पादन हुआ, जबकि 388 लाख टन यूरिया की खपत हुई। यानी देश को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में यूरिया आयात करना पड़ा।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2035-36 तक यूरिया की मांग बढ़कर 444 लाख टन तक पहुंच सकती है। अगर उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ाई गई, तो आयात पर निर्भरता और बढ़ सकती है।
किन कारखानों को दोबारा शुरू करने की बात हो रही है?
संसदीय समिति ने सरकार से तीन पुराने यूरिया संयंत्रों की स्थिति की जांच करने को कहा है—
- दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल)
- हल्दिया (पश्चिम बंगाल)
- कोरबा (छत्तीसगढ़)
ये कारखाने कई वर्षों से बंद पड़े हैं। समिति का कहना है कि इन्हें केवल भविष्य की योजनाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, बल्कि तय समयसीमा के भीतर यह जांच होनी चाहिए कि इन्हें दोबारा शुरू करना संभव है या नहीं।
कोरबा प्लांट पर विशेष ध्यान देने की सलाह
समिति ने कहा कि सरकार की ओर से कोरबा प्लांट के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। इसलिए इस संयंत्र की तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता का अलग से अध्ययन किया जाए।
रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) जैसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर कोरबा संयंत्र को दोबारा शुरू करने की संभावना पर भी विचार किया जाए।
सरकार पहले से कई नए यूरिया प्लांट बना रही है
उर्वरक विभाग ने समिति को बताया कि सरकार पहले से कई बंद पड़े कारखानों को संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) के जरिए दोबारा शुरू करने पर काम कर रही है।
इनमें शामिल हैं—
- रामागुंडम (तेलंगाना)
- गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)
- सिंदरी (झारखंड)
- बरौनी (बिहार)
- तालचर (ओडिशा)
इनमें से तालचर परियोजना पर अभी काम चल रहा है। सरकार का कहना है कि जब ये सभी परियोजनाएं पूरी तरह चालू हो जाएंगी, तो देश की यूरिया उत्पादन क्षमता में 63.5 लाख टन प्रति वर्ष की बढ़ोतरी होगी।
इसके अलावा असम के नामरूप में भी नए उर्वरक संयंत्र को मंजूरी दी जा चुकी है।
सरकार का क्या कहना है?
उर्वरक विभाग का कहना है कि पहले जिन नए कारखानों को मंजूरी दी गई है, उन्हें पूरी तरह चालू होने दिया जाए। इसके बाद यह देखा जाएगा कि मांग और उत्पादन के बीच कितना अंतर बचता है। उसी आधार पर यह फैसला लिया जाएगा कि दुर्गापुर, हल्दिया और कोरबा जैसे पुराने संयंत्रों को दोबारा शुरू करना जरूरी है या नहीं।
पुराने कारखानों को चालू करना आसान नहीं
विशेषज्ञों का कहना है कि कई वर्षों से बंद पड़े किसी भी कारखाने को फिर से शुरू करना आसान नहीं होता। इसके लिए भारी निवेश, नई तकनीक, पर्यावरणीय मंजूरी और कच्चे माल की उपलब्धता जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
इसी वजह से संसदीय समिति ने सुझाव दिया है कि पहले इन तीनों कारखानों की तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता (Techno-Economic Feasibility Study) कराई जाए। इससे यह स्पष्ट होगा कि इन्हें दोबारा शुरू करना कितना व्यावहारिक और लाभदायक होगा।
किसानों और देश के लिए क्यों है यह अहम?
यूरिया भारतीय खेती में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला उर्वरक है। अगर देश में उत्पादन बढ़ता है, तो आयात पर निर्भरता कम होगी, सरकार का आयात खर्च घट सकता है और किसानों को समय पर खाद मिलने की संभावना बढ़ेगी।





