खेती आज ऐसे दौर से गुजर रही है, जब मौसम की अनिश्चितता किसानों के सामने बड़ी चुनौती बनती जा रही है। कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ता है, तो कहीं कम समय में अत्यधिक बारिश फसलों को नुकसान पहुंचाती है। तापमान में बढ़ोतरी, वर्षा के बदलते पैटर्न और कीट-रोगों के बढ़ते जोखिम का असर फसल उत्पादन, खेती की लागत और किसानों की आय पर पड़ सकता है। और ऐसा हो भी रहा है। भारत ही नहीं, दुनिया के कई देश अल नीनो के दुष्प्रभावों की चपेट में हैं। ऐसे समय में कृषि को अधिक सक्षम, टिकाऊ और जलवायु के प्रभावों के प्रति लचीला बनाना जरूरी है।
इस दिशा में जलवायु-स्मार्ट कृषि (Climate-Smart Agriculture—CSA) एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है। इसका उद्देश्य खेती की उत्पादकता और किसानों की आजीविका को बेहतर बनाने के साथ-साथ जलवायु जोखिमों को कम करना और प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना है। इसके लिए किसी एक तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कई कृषि पद्धतियों और तकनीकों को साथ अपनाना होगा।
जलवायु के अनुकूल फसलें और विविधीकरण
जलवायु परिवर्तन और उसके चलते होने वाली चरम घटनाओं के जोखिमों से निपटने के लिए ऐसी फसल किस्मों का चयन उपयोगी हो सकता है, जो सूखे, अधिक तापमान या कुछ प्रमुख कीटों और रोगों के प्रति सहनशील हों। फसल चक्र, अंतरवर्तीय खेती (Intercropping) और फसल विविधीकरण भी जोखिम को बांटने में मदद कर सकते हैं।
एक ही फसल पर पूरी निर्भरता होने से मौसम या बाजार में बदलाव का असर अधिक पड़ सकता है। स्थानीय जलवायु, मिट्टी, पानी की उपलब्धता और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर फसल योजना बनाना इसलिए जरूरी है।
कृषि में AI और ड्रोन की भूमिका
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मौसम संबंधी जानकारी और डिजिटल सलाह किसानों को बेहतर निर्णय लेने में मदद कर सकती हैं। मौसम के पूर्वानुमान, मिट्टी की स्थिति और फसल की बढ़वार से जुड़ी जानकारी के आधार पर बुवाई के समय, सिंचाई और पोषक तत्वों के प्रबंधन की योजना अधिक सटीक बनाई जा सकती है।
ड्रोन और उनमें लगे मल्टीस्पेक्ट्रल तथा थर्मल सेंसर खेतों की निगरानी में उपयोगी हो सकते हैं। इनके जरिए फसल की सेहत, खेत में असमान वृद्धि या संभावित तनाव के संकेतों की पहचान करने में सहायता मिलती है।
हालांकि, तकनीक का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब वह किसानों की जरूरतों के अनुरूप, किफायती और आसानी से उपलब्ध हो तथा किसानों को उसका उपयोग करने का प्रशिक्षण भी मिले।
मिट्टी और पानी का संरक्षण
जलवायु-स्मार्ट कृषि की बुनियाद मिट्टी और पानी का संरक्षण है। संरक्षण आधारित जुताई, खेत में जैविक पदार्थ बढ़ाना, कंपोस्ट और हरी खाद का इस्तेमाल तथा मिट्टी की उर्वरता और जैविक गतिविधियों को बनाए रखना महत्वपूर्ण कदम हैं। ये उपाय मिट्टी की संरचना सुधारने और कटाव का जोखिम कम करने में मदद कर सकते हैं।
पानी के बेहतर प्रबंधन के लिए ड्रिप, स्प्रिंकलर और अन्य सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियां उपयोगी हैं। वर्षा जल संचयन और खेत में उपलब्ध पानी को रोकने के उपाय भी महत्वपूर्ण हैं। सिंचाई की तकनीक का चयन फसल, मिट्टी, जल उपलब्धता और किसान की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
एकीकृत पोषण और कीट प्रबंधन
फसल को संतुलित पोषण देना और कीटों का समय पर, उचित तरीके से प्रबंधन करना टिकाऊ खेती के अहम हिस्से हैं। जैव उर्वरकों, नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाली फसलों और जैविक नियंत्रण उपायों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार अपनाया जा सकता है।
नैनो उर्वरकों सहित किसी भी कृषि इनपुट का उपयोग उसकी अनुशंसित मात्रा, सही विधि और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार किया जाना चाहिए। इससे अनावश्यक लागत और संसाधनों की बर्बादी कम करने में मदद मिल सकती है।
किसान प्रशिक्षण और सामूहिक प्रयास
नई तकनीक या कृषि पद्धति को अपनाने के लिए केवल जानकारी देना पर्याप्त नहीं है। किसानों को खेत स्तर पर प्रशिक्षण, प्रदर्शन और निरंतर तकनीकी सलाह की जरूरत होती है।
किसान समूह, सहकारी संस्थाएं और स्थानीय संसाधन-साझाकरण नेटवर्क मशीनों, ज्ञान और सेवाओं तक पहुंच आसान बना सकते हैं। कृषि विशेषज्ञों, वैज्ञानिक संस्थानों, सहकारी संगठनों और किसानों के बीच संवाद से स्थानीय समस्याओं के व्यावहारिक समाधान विकसित किए जा सकते हैं।
कृषि वानिकी और पुनर्योजी खेती
कृषि वानिकी यानी खेती के साथ उपयुक्त पेड़ों को शामिल करना, स्थानीय परिस्थितियों में मिट्टी, जैव विविधता और किसानों की आय के लिए लाभकारी हो सकता है। इसी तरह पुनर्योजी खेती (Regenerative Farming) मिट्टी की सेहत सुधारने, जैविक पदार्थ बढ़ाने और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा पर जोर देती है।
इन पद्धतियों को अपनाते समय क्षेत्र की जलवायु, भूमि, पानी, फसल प्रणाली और किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
समाधान-केंद्रित कृषि की ओर
जलवायु परिवर्तन का सामना केवल एक नई मशीन, उर्वरक या तकनीक से नहीं किया जा सकता। इसके लिए जलवायु के अनुकूल फसल चयन, मिट्टी और पानी का संरक्षण, संतुलित पोषण, एकीकृत कीट प्रबंधन, डिजिटल तकनीक, किसान प्रशिक्षण और सामुदायिक सहयोग को साथ लेकर चलना होगा।
किसानों तक भरोसेमंद जानकारी और उपयोगी समाधान सरल भाषा में पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। जब वैज्ञानिक सलाह स्थानीय अनुभव और खेत की वास्तविक परिस्थितियों से जुड़ती है, तभी उसका लाभ व्यापक स्तर पर मिल सकता है।
जलवायु-स्मार्ट कृषि का लक्ष्य खेती को अधिक उत्पादक, संसाधन-कुशल और बदलते मौसम के प्रति लचीला बनाना है—ताकि किसानों की आजीविका सुरक्षित रहे और कृषि का भविष्य अधिक टिकाऊ बन सके।
नोट- लेखक इफको में वरिष्ठ प्रबंधक और बागवानी विशेषज्ञ हैं, ये उनके निजी विचार हैं।





