धान की खेती में ज्यादा पानी की जरूरत और फसल कटने के बाद पराली जलाना किसानों के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी बड़ी चुनौती है। अब किसानों को ऐसी खेती अपनाने के लिए आर्थिक फायदा भी दिया जा रहा है, जिससे पानी की बचत हो, पराली जलाने की जरूरत कम हो और मिट्टी में कार्बन बना रहे। पंजाब और हरियाणा के 2,550 किसानों को पहली बार उनके खेतों में कार्बन बचाने और खेती से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए सीधे पैसे दिए गए हैं। यानी किसान अगर ऐसी खेती करता है जिससे मिट्टी में कार्बन बढ़ता है और पानी-पानी की बचत होती है, तो उसे इसका भी आर्थिक लाभ मिल सकता है।
इन किसानों को 3,000 से 15,000 रुपये तक का भुगतान किया गया है। यह पैसा Direct Seeded Rice यानी DSR, कम जुताई और फसल अवशेष प्रबंधन जैसी तकनीकों को अपनाने के बदले मिला है। इन तरीकों से खेती में पानी की जरूरत कम करने, मिट्टी की सेहत सुधारने और पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करने में मदद मिलती है।
2,550 किसानों को मिला भुगतान
17 सितंबर को पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना में आयोजित कार्यक्रम में पंजाब और हरियाणा के 2,550 किसानों को Direct Benefit Transfer यानी DBT के जरिए भुगतान शुरू किया गया। कुल मिलाकर किसानों को 2.9 करोड़ रुपये से ज्यादा दिए जाने हैं।
यह भुगतान Grow Indigo के ‘Aadi’ किसान कार्बन कार्यक्रम के तहत किया गया है। यह कार्यक्रम 2019 में शुरू हुआ था और इसमें ICAR की तकनीकी मदद भी ली गई। 2019 से 2022 के बीच किसानों ने DSR, कम जुताई और फसल अवशेष प्रबंधन जैसी तकनीकें अपनाईं।
खेती के तरीके से कैसे बनता है Carbon Credit?
साधारण भाषा में समझें तो किसान जब ऐसी खेती करता है, जिससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होता है या मिट्टी में ज्यादा कार्बन जमा होता है, तो इस पर्यावरणीय फायदे को मापा जाता है। इसके बाद तय प्रक्रिया के तहत Carbon Credit जारी किए जाते हैं।
इस कार्यक्रम में किसानों के खेतों में हुए बदलाव को कई साल तक मापा गया और स्वतंत्र रूप से इसकी जांच की गई। इसके बाद Carbon Credits जारी किए गए। कार्यक्रम में Verra की VM0042 methodology का इस्तेमाल किया गया है।
DSR से पानी की बचत
इस पहल में Direct Seeded Rice यानी DSR पर खास जोर दिया गया है। पारंपरिक खेती में धान की पौध तैयार करके खेत में रोपाई की जाती है, जबकि DSR में धान की सीधे खेत में बुवाई की जाती है। इससे धान की खेती में पानी की जरूरत कम करने में मदद मिल सकती है।
कार्यक्रम के मुताबिक 2019 से 2022 के बीच शामिल खेतों में DSR और दूसरी टिकाऊ खेती तकनीकों से करीब 45 अरब लीटर पानी की बचत का अनुमान है।
पराली जलाने में भी कमी
फसल अवशेष यानी पराली को खेत में जलाने के बजाय उसका प्रबंधन करने पर भी इस कार्यक्रम में जोर दिया गया। आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान 2 लाख टन से ज्यादा फसल अवशेष को जलने से बचाया गया, जिससे अनुमानित तौर पर करीब 1,000 टन PM2.5 उत्सर्जन से बचाव हुआ।
पंजाब में भी पराली जलाने की घटनाओं में कमी दर्ज की गई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2025 के धान कटाई सीजन में राज्य में 5,114 खेतों में आग लगाने की घटनाएं दर्ज हुईं। यह मौजूदा निगरानी व्यवस्था शुरू होने के बाद सबसे कम आंकड़ा बताया गया है।
किसानों को दो तरह से भुगतान का विकल्प
खास बात यह है कि किसानों को Carbon Credits की पूरी बिक्री होने का इंतजार नहीं करना पड़ा। Grow Indigo ने अपनी तरफ से किसानों को भुगतान किया।
किसानों के पास भुगतान के लिए दो विकल्प थे। वे एक तय रकम पहले ले सकते थे या Carbon Credits बिकने के बाद मिलने वाली शुद्ध Carbon Revenue का 75 प्रतिशत हिस्सा चुन सकते थे।
पहले चरण में करीब 30 हजार एकड़ क्षेत्र से 50 हजार से ज्यादा Carbon Credits जारी हुए हैं। इसमें शामिल किसानों को करीब 3,000 से 15,000 रुपये तक मिले हैं।
आगे और किसानों को मिलेगा फायदा
जो किसान 2022 के बाद इस कार्यक्रम से जुड़े हैं, उनके खेतों की अभी निगरानी और जांच की प्रक्रिया चल रही है। Carbon Credits जारी होने के बाद उन्हें भी भुगतान किया जाएगा।
Grow Indigo के मुताबिक यह कार्यक्रम सात राज्यों में 2 लाख एकड़ से ज्यादा क्षेत्र और 1 लाख से अधिक किसानों तक पहुंच चुका है। इसमें खेती में कम जुताई, फसल अवशेष को खेत में रखना, DSR, फसल विविधीकरण और पानी के बेहतर इस्तेमाल जैसी तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
खेती और पर्यावरण दोनों के लिए नई दिशा
किसानों के लिए यह पहल इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें पर्यावरण बचाने वाली खेती को सिर्फ सलाह तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उससे मिलने वाले फायदे को किसान की आय से जोड़ने की कोशिश की गई है। यानी किसान पानी बचाए, मिट्टी में कार्बन बढ़ाए और पराली जलाने से बचे तो उसके इस काम को मापा जाए और उसके आधार पर आर्थिक फायदा दिया जाए।
हालांकि Carbon Credit पाने के लिए खेती के तरीकों का रिकॉर्ड रखना, वैज्ञानिक तरीके से उसका आकलन और स्वतंत्र सत्यापन जरूरी है। पंजाब और हरियाणा के 2,550 किसानों को मिला यह पहला भुगतान इसी पूरी प्रक्रिया का उदाहरण है।





