हरा या गहरे हरे रंग का, आकार अंडाकार या नाशपाती जैसा, अंदर हल्के हरे रंग का नरम और मलाईदार गूदा और बीच में एक बड़ा बीज... और स्वाद में न खट्टा, न मीठा, न तीखा.. क्रीमी-क्रीमी सा बस बिना किसी खास स्वाद का, लेकिन पोषक तत्वों से भरपूर... यही है एवोकाडो की पहचान।
कभी विदेशी फल माना जाने वाला एवोकाडो पिछले कुछ सालों में भारतीयों की पसंद बन गया है। इसकी बढ़ती मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत में हर साल करीब 15 हजार टन एवोकाडो आयात करना पड़ रहा है। मांग बढ़े भी क्यों नहीं, एक तरफ फास्ट फूड के शौकीन लोग हैं, तो दूसरी तरफ अपनी सेहत को लेकर जागरूक लोग भी हैं, जो इसे अपने डाइट में शामिल कर रहे हैं। एवोकाडो का इस्तेमाल सलाद, सैंडविच, टोस्ट, डिप, स्मूदी और कई तरह की हेल्दी डिश में किया जाता है। इसमें अच्छे फैट, फाइबर, पोटैशियम और कई जरूरी पोषक तत्व भी पाए जाते हैं।
तो आखिर भारत में एवोकाडो की मांग क्यों बढ़ रही है? देश में इसका कितना उत्पादन होता है और कितनी मात्रा में आयात किया जाता है? क्या किसान इसकी बढ़ती मांग को कमाई के नए मौके के तौर पर देख सकते हैं? आइए जानते हैं देश में एवोकाडो की बढ़ती मांग, आयात और इसकी बागवानी के बारे में।
भारत में बढ़ी मांग, लेकिन उत्पादन कम
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल करीब 15 हजार टन एवोकाडो का आयात होता है, जबकि देश में इसका उत्पादन सिर्फ 8 से 9 हजार टन के आसपास है। यानी घरेलू उत्पादन मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक, मांग और आपूर्ति के इस अंतर में किसानों के लिए कारोबार का बड़ा अवसर मौजूद है। खासकर कॉफी और काली मिर्च जैसी पारंपरिक फसलों पर जलवायु परिवर्तन का असर बढ़ने के कारण फसल विविधीकरण जरूरी हो गया है।
मांग बढ़ी तो बदली खेती
केरल के वायनाड स्थित कॉटनाड प्लांटेशन में पहले एवोकाडो को मुख्य फसल के तौर पर नहीं लगाया जाता था। यहां इसे कॉफी के पेड़ों को छाया देने के लिए लगाया गया था। लेकिन करीब 15 साल पहले इसकी मांग बढ़ने लगी और धीरे-धीरे इसकी खेती का रकबा भी बढ़ाया गया।
अब कॉटनाड प्लांटेशन में करीब 40 एकड़ में एवोकाडो लगाया गया है। पिछले साल यहां करीब 10 से 15 टन फल मिला। कंपनी अगले तीन-चार साल में उत्पादन बढ़ाकर 40 से 50 टन तक पहुंचाना चाहती है।
विदेशी किस्मों की मांग ज्यादा
एवोकाडो की बढ़ती मांग का असर रेस्तरां और बाजार में भी देखने को मिल रहा है। मुंबई के एक रेस्तरां के कार्यकारी शेफ के मुताबिक, भारतीय एवोकाडो की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, लेकिन अलग-अलग मौसम और इलाकों की वजह से इसके आकार, स्वाद, बनावट और पकने की स्थिति में काफी अंतर देखने को मिलता है। इसलिए उनके रेस्तरां फिलहाल आयातित एवोकाडो को प्राथमिकता देते हैं।
भारत में हास और पिंकर्टन जैसी विदेशी किस्मों की पौध की मांग भी बढ़ रही है। भोपाल स्थित इंडो-इजराइल एवोकाडो नर्सरी के संस्थापक हर्षित गोदहा के मुताबिक, पिछले पांच साल में उनकी नर्सरी देशभर के किसानों को करीब 18 हजार पौधे दे चुकी है।
एवोकाडो की व्यावसायिक खेती आसान नहीं
हालांकि, बढ़ती मांग को देखकर एवोकाडो की खेती शुरू करना इतना आसान नहीं है। व्यावसायिक खेती के लिए बीज से तैयार पेड़ के बजाय स्थानीय मौसम और मिट्टी के अनुकूल जड़ वाले पौधे पर पसंद की किस्म की शाखा जोड़कर पौध तैयार करनी होती है।
पेड़ों की नियमित छंटाई भी जरूरी है, क्योंकि ये छह-सात साल में करीब 25 फुट तक ऊंचे हो सकते हैं। इसके अलावा अच्छी पैदावार के लिए अलग-अलग किस्मों को सही अनुपात में लगाना और उचित परागण का ध्यान रखना भी जरूरी है।
भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु ने स्थानीय पेड़ों के आधार पर एवोकाडो की दो किस्में भी विकसित की हैं।
जानकारों के मुताबिक, देश में एवोकाडो की खेती को बढ़ावा देने के लिए अच्छी पैदावार देने वाली और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल पौध तैयार करना जरूरी है। इससे घरेलू उत्पादन बढ़ेगा और आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
मतलब ये कि एवोकाडो की बढ़ती मांग किसानों के लिए कमाई का एक नया विकल्प बन रही है, लेकिन इसकी खेती शुरू करने से पहले जलवायु, किस्म, पौध और बाजार की अच्छी जानकारी होना बेहद जरूरी है।





