अब किसान एक ही खेत से फसल भी उगा सकेंगे और सोलर पैनल लगाकर बिजली भी बना सकेंगे। खेती और सौर ऊर्जा को एक साथ जोड़ने वाले इस तरीके को एग्रीवोल्टाइक (Agrivoltaics) कहा जाता है। बुधवार, 21 अक्टूबर को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में 7वें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि एग्रीवोल्टाइक से किसानों की आमदनी बढ़ सकती है, लेकिन इसकी योजना ऐसी होनी चाहिए, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को भी फायदा मिले।
क्या है एग्रीवोल्टाइक तकनीक?
इस तकनीक में खेतों के ऊपर सोलर पैनल लगाए जाते हैं और उनके नीचे फसल उगाई जाती है। यानी किसान को एक ही जमीन से दो फायदे मिल सकते हैं। एक तरफ फसल से कमाई होगी, तो दूसरी तरफ सोलर पैनल से बिजली बनाकर अतिरिक्त आय का रास्ता खुलेगा।
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत में 85 फीसदी से ज्यादा किसान छोटे और सीमांत हैं। इसलिए एग्रीवोल्टाइक का मॉडल ऐसा होना चाहिए, जिसे छोटे किसान भी अपना सकें और उनकी खेती पर इसका बुरा असर न पड़े।
सोलर पैनल लगाने में इन बातों का रखना होगा ध्यान
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि खेत में सोलर पैनल लगाते समय उनकी ऊंचाई और खंभों के बीच की दूरी का ध्यान रखना जरूरी है, ताकि किसान आसानी से जुताई कर सकें और अपनी जरूरत के हिसाब से फसल बदल सकें।
इसके अलावा, पैनलों से गिरने वाले बारिश के पानी को सही तरीके से निकालने और जमा करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए, ताकि मिट्टी का कटाव न हो। उन्होंने यह भी कहा कि बिजली की बिक्री, ग्रिड तक बिजली पहुंचाने और किसानों को समय पर भुगतान करने की व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए।
सरकार की कोशिश है कि किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को इस तकनीक से जोड़ा जाए। साथ ही, गांवों के युवाओं और महिलाओं को सोलर पैनल लगाने, उनकी मरम्मत और रखरखाव का प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि गांवों में ही रोजगार के अवसर पैदा हों।
देश की 4.75 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर संभव है एग्रीवोल्टाइक
केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने सम्मेलन में बताया कि TERI के एक अध्ययन के मुताबिक, भारत की करीब 4.75 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि एग्रीवोल्टाइक के लिए तकनीकी रूप से उपयुक्त है। इसमें महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की बड़ी हिस्सेदारी है।
उन्होंने कहा कि अगर इस उपयुक्त जमीन के सिर्फ 10 फीसदी हिस्से पर भी एग्रीवोल्टाइक तकनीक अपनाई जाए, तो 2050 तक देश की अनुमानित बिजली की जरूरत पूरी करने में मदद मिल सकती है। कुछ अध्ययनों में इस तकनीक के तहत फसलों की पैदावार में 10 से 20 फीसदी तक बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है। हालांकि, इसका फायदा फसल, मौसम और पैनलों की बनावट पर निर्भर करेगा।
PM-KUSUM योजना के अगले चरण में शुरू होगा बड़ा अभियान
प्रह्लाद जोशी ने बताया कि PM-KUSUM योजना के तहत अब तक 30 लाख कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ा जा चुका है। इससे किसानों को सिंचाई के लिए दिन में बिजली उपलब्ध कराने में मदद मिली है।
उन्होंने यह भी घोषणा की कि सरकार PM-KUSUM योजना के अगले चरण में एग्रीवोल्टाइक को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी कर रही है। अनुमान है कि इस क्षेत्र में करीब 3.32 लाख स्थानीय रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इससे ग्रामीण युवाओं को अपने गांव और आसपास ही रोजगार मिलने की संभावना बढ़ेगी।
सरकार का मानना है कि एग्रीवोल्टाइक तकनीक खेती और स्वच्छ ऊर्जा, दोनों को बढ़ावा दे सकती है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि सोलर पैनल लगाने से किसानों की खेती प्रभावित न हो और उन्हें बिजली से होने वाली कमाई का उचित लाभ मिले।





