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₹6,000 करोड़ की कपास योजना को अब भी कैबिनेट मंजूरी का इंतज़ार, घटता रकबा और पैदावार बनी बड़ी चुनौती

केंद्र सरकार की ₹6,000 करोड़ की कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन योजना को अभी कैबिनेट मंजूरी नहीं मिली है। योजना में फंड बंटवारे को लेकर विवाद है, क्योंकि कपड़ा मंत्रालय को 22% हिस्सा मिल रहा है, जबकि कपास की

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Pooja Rai· Correspondent

29 दिसंबर 2025· 3 min read

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₹6,000 करोड़ की कपास योजना को अब भी कैबिनेट मंजूरी का इंतज़ार, घटता रकबा और पैदावार बनी बड़ी चुनौती

₹6,000 करोड़ की कपास योजना को अब भी कैबिनेट मंजूरी का इंतज़ार, घटता रकबा और पैदावार बनी बड़ी चुनौती

केंद्र सरकार की ₹6,000 करोड़ की कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन योजना को अभी कैबिनेट मंजूरी नहीं मिली है। योजना में फंड बंटवारे को लेकर विवाद है, क्योंकि कपड़ा मंत्रालय को 22% हिस्सा मिल रहा है, जबकि कपास की रिसर्च की जिम्मेदारी संभालने वाले ICAR को 10% से भी कम फंड मिल सकता है। इस बीच देश में कपास उत्पादन और रकबा लगातार घट रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों की आय बढ़ाने और पैदावार सुधारने के लिए रिसर्च, बेहतर किस्मों और किसानों का भरोसा मजबूत करना जरूरी है।

केंद्र सरकार ने कपास की पैदावार बढ़ाने के लिए करीब ₹6,000 करोड़ की “Cotton Productivity Mission” योजना का ऐलान किया था, लेकिन इसे अभी तक कैबिनेट की मंजूरी नहीं मिल पाई है। जबकि योजना को घोषित हुए लगभग 11 महीने हो चुके हैं।

ICAR को 10 प्रतिशत से भी कम फंड
एक रिपोर्ट के मुताबिक, कपड़ा मंत्रालय (Textiles Ministry) ने इस योजना के कुल बजट का 20 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा (करीब ₹1,100 करोड़) अपने लिए सुरक्षित कर लिया है। वहीं, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), जिस पर असल में नई किस्में विकसित करने और उत्पादन बढ़ाने की जिम्मेदारी है, उसे 10 प्रतिशत से भी कम फंड मिलने की संभावना है।

आईसीएआर को ज्यादा संसाधन की जरूरत
बिजनेस लाइन के अनुसार आईसीएआर के एक पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक का कहना है कि यह संतुलन सही नहीं है। उनका मानना है कि आईसीएआर को ज्यादा संसाधन मिलने चाहिए, क्योंकि पूरी जिम्मेदारी उसी पर डाली जा रही है। उन्होंने सुझाव दिया कि बासमती चावल की तरह कपास की अच्छी किस्मों को लोकप्रिय बनाने की रणनीति अपनाई जानी चाहिए और कपड़ा मंत्रालय को उद्योग और किसानों के बीच सेतु की भूमिका निभानी चाहिए, न कि ज्यादा पैसा लेने की।

फंड का बंटवारा कैसे होगा?
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग को सबसे ज्यादा हिस्सा मिलने की संभावना है — ₹4,000 करोड़ से ज्यादा (लगभग 69%)
कपड़ा मंत्रालय को करीब ₹1,100 करोड़ (22%)
ICAR को सिर्फ ₹600 करोड़ से कम (करीब 9%), वह भी पांच साल की अवधि के लिए

ये भी पढ़ें - IFFCO का नया प्राकृतिक उत्पाद ‘धर्मामृत’ लॉन्च, नैनो उर्वरकों के साथ टिकाऊ खेती पर फोकस

कपास उत्पादन की बड़ी चुनौती
भारत में कपास उत्पादन लगातार दबाव में है।
2025-26 में उत्पादन घटकर 2.92 करोड़ गांठ रह गया, जो पिछले साल से भी कम है।
पिछले चार साल में कपास का रकबा 20 लाख हेक्टेयर घटा है।
भारत में औसत पैदावार 5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से भी कम है, जबकि वैश्विक औसत करीब 9 क्विंटल और अमेरिका में लगभग 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

वित्त मंत्री ने क्या कहा था?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में कहा था कि यह मिशन लाखों कपास किसानों की आय बढ़ाने, टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने और एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल कपास को प्रोत्साहित करने के लिए है। यह सरकार की 5F नीति (Farm से Fashion तक) का हिस्सा है, ताकि किसानों को बेहतर दाम मिलें और कपड़ा उद्योग को अच्छी गुणवत्ता की कपास मिल सके।वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस मिशन को सफल बनाना है, तो फंड का सही इस्तेमाल, रिसर्च पर जोर और किसानों का भरोसा सबसे जरूरी होगा।

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