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19% बढ़ा चावल निर्यात, नॉन-बासमती और बासमती दोनों की बढ़ी विदेशों में मांग

भारत से चावल का निर्यात 19.4% बढ़कर 2.15 करोड़ टन हो गया है। निर्यात प्रतिबंध हटने और रिकॉर्ड उत्पादन के कारण भारतीय चावल अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ता और ज्यादा प्रतिस्पर्धी बना, जिससे थाईलैंड और विय

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Pooja Rai· Correspondent

12 जनवरी 2026· 2 min read

19% बढ़ा चावल निर्यात, नॉन-बासमती और बासमती दोनों की बढ़ी विदेशों में मांग

19% बढ़ा चावल निर्यात, नॉन-बासमती और बासमती दोनों की बढ़ी विदेशों में मांग

भारत से चावल का निर्यात 19.4% बढ़कर 2.15 करोड़ टन हो गया है। निर्यात प्रतिबंध हटने और रिकॉर्ड उत्पादन के कारण भारतीय चावल अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ता और ज्यादा प्रतिस्पर्धी बना, जिससे थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों का निर्यात घटा और कई गरीब देशों को सस्ते दाम पर चावल मिला।

भारत से चावल का निर्यात पिछले साल तेज़ी से बढ़ा है। सरकार द्वारा चावल के निर्यात पर लगी सभी पाबंदियाँ हटाने के बाद भारत का चावल दुनिया के बाज़ार में और सस्ता व प्रतिस्पर्धी हो गया। इसी वजह से चावल का निर्यात सालाना करीब 19.4 प्रतिशत बढ़ गया और यह अब तक के दूसरे सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया।

करीब 2.15 करोड़ टन चावल निर्यात
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, 2025 में भारत ने करीब 2.15 करोड़ टन चावल निर्यात किया, जबकि इससे पहले साल यह आंकड़ा 1.80 करोड़ टन था। इससे पहले 2022 में सबसे ज़्यादा 2.23 करोड़ टन चावल निर्यात हुआ था।भारत में रिकॉर्ड उत्पादन होने और बाजार में पर्याप्त आपूर्ति के कारण सरकार ने 2022–23 में लगाए गए सभी निर्यात प्रतिबंध हटा दिए। इसके बाद भारतीय चावल की खेप तेजी से विदेशी बाजारों तक पहुँचने लगी।

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नॉन-बासमती चावल के निर्यात में 25% की बढ़ोतरी
बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक नॉन-बासमती चावल का निर्यात सबसे ज्यादा बढ़ा और इसमें करीब 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं बासमती चावल का निर्यात भी 8 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया।भारत से नॉन-बासमती चावल की ज्यादा सप्लाई बांग्लादेश, बेनिन, कैमरून, आइवरी कोस्ट और जिबूती जैसे देशों में हुई। वहीं ईरान, यूएई और ब्रिटेन ने भारतीय बासमती चावल की ज्यादा खरीद की।

अंतरराष्ट्रीय बाजार का क्या है हाल?
भारतीय चावल की ज्यादा सप्लाई से थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों का निर्यात प्रभावित हुआ और एशिया में चावल के दाम करीब 10 साल के निचले स्तर पर आ गए। इससे अफ्रीका और गरीब देशों के उपभोक्ताओं को सस्ता चावल मिला।उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय चावल की कीमतें बाकी देशों के मुकाबले कम हैं, जिससे भारत ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी खोई हुई हिस्सेदारी फिर से हासिल कर ली है।

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