केंद्र सरकार की श्रम, कृषि और आर्थिक नीतियों के विरोध में केंद्रीय श्रमिक संघों और संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने 10 अगस्त से देशभर में आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया है। नई दिल्ली में आयोजित 'मजदूरों और किसानों के दूसरे राष्ट्रीय सम्मेलन' में यह फैसला लिया गया। संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो आने वाले समय में आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
सम्मेलन में 10 केंद्रीय श्रमिक संघों, विभिन्न क्षेत्रों के कर्मचारी संगठनों और संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बैठक में एक संयुक्त प्रस्ताव भी पारित किया गया, जिसमें केंद्र सरकार पर मजदूरों, किसानों, छात्रों और युवाओं के हितों की अनदेखी कर कॉर्पोरेट समर्थक नीतियां अपनाने का आरोप लगाया गया।
MSP की कानूनी गारंटी समेत कई प्रमुख मांगें
सम्मेलन में सरकार के सामने कई मांगें रखी गईं। इनमें सभी फसलों पर MSP की कानूनी गारंटी और सरकारी खरीद सुनिश्चित करने, चारों नए श्रम कानून (लेबर कोड) रद्द करने, मनरेगा को मजबूत करने, बिजली संशोधन विधेयक वापस लेने, सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी सेवाओं के निजीकरण पर रोक लगाने, पुरानी पेंशन योजना (OPS) बहाल करने, सरकारी विभागों के खाली पद भरने और सभी श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था लागू करने की मांग शामिल है।
विदेश व्यापार समझौतों का भी किया विरोध
सम्मेलन में अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के साथ भारत की चल रही व्यापार वार्ताओं का भी विरोध किया गया। किसान और श्रमिक संगठनों का कहना है कि इन समझौतों से कृषि, एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग) और घरेलू उद्योगों को नुकसान हो सकता है।
10 अगस्त को देशभर में होंगे प्रदर्शन
संगठनों ने भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ के अवसर पर 10 अगस्त को देशभर में विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। इस दिन जिला और राज्य स्तर पर प्रदर्शन, धरना, रैलियां, रेल रोको, रास्ता रोको और अन्य आंदोलनकारी कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
राकेश टिकैत ने एकजुट होकर लड़ने की अपील की
सम्मेलन को संबोधित करते हुए भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि किसानों और मजदूरों को अपना संघर्ष और तेज करना होगा। उन्होंने कहा कि जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर बंटने के बजाय सभी को एकजुट होकर आंदोलन करना चाहिए। उनके मुताबिक, मजबूत और संयुक्त आंदोलन से ही सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है।
वहीं ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन (AICCTU) के नेता राजीव डिमरी ने कहा कि हाल के छात्र आंदोलनों ने यह साबित किया है कि संगठित जन आंदोलन प्रभावी होते हैं। उन्होंने कहा कि छात्रों और युवाओं के आंदोलन ने शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर किया था। अब जरूरत है कि किसान, मजदूर, छात्र और युवा मिलकर सरकार की नीतियों के खिलाफ अपनी आवाज और मजबूत करें।
मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन होगा और तेज
सम्मेलन के अंत में किसान और श्रमिक संगठनों ने कहा कि यदि सरकार उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं करती है, तो आने वाले महीनों में राज्यों में बड़े स्तर पर संयुक्त आंदोलन चलाया जाएगा। उनका कहना है कि यह लड़ाई केवल किसानों और मजदूरों की नहीं, बल्कि रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और आम लोगों के अधिकारों की भी है।





