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टिशू कल्चर तकनीक से कैसे उगाये जाते हैं पौधे? इसके फायदे भी जानिये

टिशू कल्चर कृषि क्षेत्र में एक क्रांति है, इसके जरिये कृषि वैज्ञानिक कम जगह, कम समय में रोग मुक्त, सूखा और कीट प्रतिरोधी पौध तैयार करते हैं। यह विशेष रूप से उच्च गुणवत्ता वाले फसलों का बड़े पैमाने पर

Pooja Rai

Pooja Rai·15 Apr 2025· 3 min read

टिशू कल्चर तकनीक से कैसे उगाये जाते हैं पौधे? इसके फायदे भी जानिये

टिशू कल्चर तकनीक से कैसे उगाये जाते हैं पौधे? इसके फायदे भी जानिये

टिशू कल्चर कृषि क्षेत्र में एक क्रांति है, इसके जरिये कृषि वैज्ञानिक कम जगह, कम समय में रोग मुक्त, सूखा और कीट प्रतिरोधी पौध तैयार करते हैं। यह विशेष रूप से उच्च गुणवत्ता वाले फसलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने के लिए उपयोगी है, जैसे कि केला, ऑर्किड, और आलू। यह एक तकनीक है, जिसमें पौधों के टिशूज , जैसे पत्तियों के कटिंग, तना कोशिकाओं, या जड़ संस्कृतियों को पोषक तत्वों से भरपूर माध्यम में नियंत्रित स्थितियों में उगाया जाता है।

टिशू कल्चर परंपरागत बीज आधारित रिप्रोडक्शन में मौजूद रोगजनकों को समाप्त करके रोग मुक्त पौधों का उत्पादन करने में मदद करता है। इससे पौधों की सेहत में सुधार होता है और उत्पादन अधिक प्रभावी होता है। संकटग्रस्त या दुर्लभ पौधों की प्रजातियों के लिए, टिशू कल्चर दीर्घकालिक संरक्षण का एक तरीका प्रदान करता है। इसके माध्यम से सटीक आनुवंशिक सुधार किया जा सकता है, जिससे बेहतर विशेषताओं वाले पौधे उत्पन्न होते हैं, जैसे कि कीटों, सूखा और रोगों के प्रति बेहतर प्रतिरोध।

ये भी पढ़ें - कश्मीर में सूखे से निपटने के लिए SKUAST ने तैयार किया एक्‍शन प्‍लान, इन फसलों की खेती करने की दी सलाह

टिशू कल्चर की प्रक्रिया कैसे होती है?
1. पौधे के ऊतकों का एक छोटा सा टुकड़ा उसके बढ़ते हुए उपरी भाग से लिया जाता है और एक जेली (Jelly) में रखा जाता है जिसमें पोषक तत्व और प्लांट हार्मोन होते हैं. ये हार्मोन पौधे के ऊतकों में कोशिकाओं को तेजी से विभाजित करते हैं जो कई कोशिकाओं का निर्माण करते हैं और एक जगह एकत्रित कर देते हैं जिसे “कैलस” (callus) कहां जाता है.
2. फिर इस “कैलस” (callus) को एक अन्य जेली (Jelly) में स्थानांतरित किया जाता है जिसमें उपयुक्त प्लांट हार्मोन होते हैं जी कि “कैलस” (callus) को जड़ों में विकसित करने के लिए उत्तेजित करते हैं.
3. विकसित जड़ों के साथ “कैलस” (callus) को एक और जेली (Jelly) में स्थानांतरित किया जाता है जिसमें विभिन्न हार्मोन होते हैं जो कि पौधें के तने के विकास को प्रोत्साहित करते हैं.
4. अब इस “कैलस” (callus) को जिसमें जड़ें और तना है को एक छोटे प्लांटलेट के रूप में अलग कर दिया जाता है. इस तरह से, कई छोटे-छोटे पौधे केवल कुछ मूल पौधे कोशिकाओं या ऊतक से उत्पन्न हो सकते हैं.
5. इस प्रकार उत्पादित प्लांटलेट को बर्तन या मिट्टी में इंप्लांट किया जाता है जहां वे परिपक्व पौधों के निर्माण के लिए विकसित हो सकते हैं.

टिशू कल्चर के लाभ
1. टिशू कल्चर एक ऐसी तकनीक है जो बहुत तेज़ी से काम करती है. इस तकनीक के माध्यम से पौधे के टिशू के एक छोटे से हिस्से को लेकर कुछ ही हफ्तों के समय में हजारों प्लांटलेट का उत्पादन किया जा सकता है.
2. टिशू कल्चर द्वारा उत्पादित नए पौधे रोग मुक्त होते हैं. इस तकनीक द्वारा रोग,प्रतिरोधी कीट रोधी तथा सूखा प्रतिरोधी किस्मो को उत्पादित किया जा सकता है.
3. टिशू कल्चर के माध्यम से पूरे वर्ष पौधों को विकसित किया जा सकता है, इस पर किसी भी मौसम का कोई असर नहीं होता है.
4. टिशू कल्चर द्वारा नए पौधों के विकास के लिए बहुत कम स्थान की आवश्यकता होती है.
5. यह बाजार में नई किस्मों के उत्पादन को गति देने में मदद करता है.
6. आलू उद्योग के मामले में, यह तकनीक वायरस मुक्त स्टॉक बनाए रखने और स्थापित करने में सहायता करती है.
यानी टिशू कल्चर तकनीक इस बात पर निर्भर करती है कि पौधों की कोशिकाओं में सम्पूर्ण पौधों को पुनरुत्पादित करने की क्षमता होती है इसे पूर्णशक्तता (totipotency) तथा कोशिका को पूर्णशक्त कोशिका कहते है.

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