देश में प्राकृतिक रबर की कीमतें पहली बार 300 रुपये प्रति किलो के पार पहुंच गई हैं। लंबे समय से कम दाम मिलने के कारण कई किसानों ने रबर के पेड़ों से दूध यानी लेटेक्स निकालना कम कर दिया था। लेकिन अब कीमतों में आई तेजी से किसानों को अच्छी कमाई की उम्मीद जगी है। इससे वे दोबारा रबर निकालने का काम शुरू कर सकते हैं।
रबर की कीमतें बढ़ने की क्या है वजह?
रबर की कीमतों में तेजी के पीछे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों तरह के कारण हैं। दक्षिण भारत के रबर उत्पादक इलाकों में भारी बारिश के चलते पेड़ों से रबर निकालने का काम प्रभावित हुआ है। इससे बाजार में सप्लाई कम हो गई। वहीं, पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं। इससे सिंथेटिक रबर महंगा हुआ है और प्राकृतिक रबर की कीमतों को भी सहारा मिला है।
इसके अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रमुख रबर उत्पादक देशों में भी उत्पादन घटा है। मौसम की अनिश्चितता और लंबे समय तक सूखे के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में रबर की उपलब्धता कम हुई है। इन सभी वजहों से कीमतों में तेजी आई है।
किसानों को क्या होगा फायदा?
इंडियन रबर डीलर्स फेडरेशन के मुताबिक, लंबे समय तक रबर की कीमतें 147 से 197 रुपये प्रति किलो के बीच रहने के कारण कई किसानों ने टैपिंग का काम बंद या कम कर दिया था। अब कीमतें 300 रुपये के पार पहुंचने से किसानों को दोबारा पेड़ों से रबर निकालने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।
हालांकि, किसानों का शीट रबर के बजाय लेटेक्स उत्पादन की ओर बढ़ता रुझान भी चिंता का विषय है। वहीं, जलवायु परिवर्तन के कारण रबर उत्पादन पर असर पड़ रहा है।
मांग के मुकाबले कम रह सकता है उत्पादन
एसोसिएशन ऑफ नेचुरल रबर प्रोड्यूसिंग कंट्रीज (ANRPC) के अनुमान के मुताबिक, साल 2026 में दुनिया में प्राकृतिक रबर का उत्पादन 15.039 मिलियन टन रहने की उम्मीद है, जबकि इसकी खपत 15.356 मिलियन टन तक पहुंच सकती है। यानी मांग के मुकाबले उत्पादन कम रहने का अनुमान है। इससे आने वाले समय में भी रबर की कीमतों को समर्थन मिल सकता है।





