आज राष्ट्रीय हथकरघा दिवस(National Handloom Day) के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से भारतीय हथकरघा उत्पादों को अपनाने और स्थानीय बुनकरों का समर्थन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि जिस तरह लोग फ्रेंडशिप डे पूरे उत्साह से मनाते हैं, उसी तरह हैंडलूम डे भी मनाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने युवाओं से हाथ से बने भारतीय कपड़े पहनने, सोशल मीडिया पर 'GRWM (Get Ready With Me)' जैसे वीडियो साझा करने और 'वोकल फॉर लोकल' अभियान को आगे बढ़ाने का आग्रह किया। उनका कहना था कि एक हैंडलूम उत्पाद खरीदना सिर्फ किसी कपड़े को खरीदना नहीं, बल्कि लाखों बुनकर परिवारों की मेहनत और भारत की समृद्ध विरासत का सम्मान करना है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर साल 7 अगस्त को ही राष्ट्रीय हथकरघा दिवस क्यों मनाया जाता है? आखिर इस दिन का संबंध भारत के स्वदेशी आंदोलन से कैसे जुड़ा है और पिछले 10 वर्षों में हथकरघा क्षेत्र के लिए क्या-क्या बदलाव हुए? आइए जानते हैं इसकी पूरी कहानी।
1905 के स्वदेशी आंदोलन से जुड़ा है इतिहास
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस की जड़ें भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी हैं। 7 अगस्त 1905 को बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई थी। इस आंदोलन के दौरान लोगों ने विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया और भारत में बने कपड़े पहनने का संकल्प लिया। इससे देश के हथकरघा उद्योग और स्थानीय बुनकरों को नई पहचान मिली। यही कारण है कि भारत सरकार ने इस ऐतिहासिक दिन को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में चुना।
2015 में हुई राष्ट्रीय हथकरघा दिवस की शुरुआत
केंद्र सरकार ने 7 अगस्त 2015 को पहली बार राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया। चेन्नई में आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य हथकरघा बुनकरों को सम्मान देना, लोगों को भारतीय हस्तनिर्मित वस्त्रों के उपयोग के लिए प्रेरित करना और इस पारंपरिक उद्योग को नई पहचान देना था।
भारत के लिए क्यों खास है हथकरघा उद्योग?
हथकरघा उद्योग भारत के सबसे पुराने कुटीर उद्योगों में से एक है। यह सिर्फ कपड़ा बनाने का काम नहीं करता, बल्कि लाखों बुनकर परिवारों की आजीविका का भी आधार है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में महिलाएं भी काम करती हैं।
भारत की कई प्रसिद्ध साड़ियां और वस्त्र पूरी दुनिया में मशहूर हैं, जिनमें बनारसी सिल्क, कांचीपुरम सिल्क, चंदेरी, महेश्वरी, पटोला, पश्मीना, मूगा सिल्क और इकट प्रमुख हैं। हाथ से बने ये वस्त्र भारत की संस्कृति, कला और परंपरा की पहचान माने जाते हैं।
पिछले 10 वर्षों में क्या बदला?
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस शुरू होने के बाद सरकार ने इस क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। इंडिया हैंडलूम ब्रांड, हैंडलूम मार्क, बुनकर क्लस्टर विकास, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियां, ऑनलाइन बिक्री को बढ़ावा और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए बुनकरों को बाजार से जोड़ने जैसी कई योजनाएं शुरू की गईं।
हाल के वर्षों में ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के जरिए भी हथकरघा उत्पादों की मांग बढ़ी है। इससे बुनकरों को देश के साथ-साथ विदेशों में भी नए बाजार मिलने लगे हैं।
पीएम मोदी ने क्या कहा?
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2026 पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत का हर हथकरघा उत्पाद अपने साथ किसी न किसी बुनकर की मेहनत, कला और परंपरा की कहानी लेकर आता है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे भारतीय हथकरघा उत्पाद पहनें, स्थानीय कारीगरों का समर्थन करें और सोशल मीडिया पर हैंडलूम को बढ़ावा दें।
प्रधानमंत्री ने कहा कि 'वोकल फॉर लोकल' सिर्फ एक अभियान नहीं, बल्कि भारत के लाखों कारीगरों और बुनकरों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का माध्यम है।
क्यों है यह दिन महत्वपूर्ण?
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस केवल एक औपचारिक दिवस नहीं है। यह उन लाखों बुनकरों को सम्मान देने का दिन है, जो पीढ़ियों से भारत की पारंपरिक बुनाई कला को जीवित रखे हुए हैं। यह दिन लोगों को स्वदेशी उत्पाद अपनाने, स्थानीय कारीगरों का समर्थन करने और भारत की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का संदेश देता है।
आज जब पूरी दुनिया टिकाऊ (Sustainable) और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की ओर बढ़ रही है, तब भारतीय हथकरघा उद्योग की अहमियत और भी बढ़ गई है। हाथ से बने कपड़ों में मशीनों की तुलना में कम ऊर्जा खर्च होती है और यह पर्यावरण के लिए भी बेहतर माने जाते हैं।





