वर्ष 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन में महाराष्ट्र में बारिश का वितरण बेहद असमान रहा। 1 जून से 30 सितंबर तक के चार महीनों में राज्य में लगभग 804.4 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो दीर्घकालिक औसत से करीब 19 प्रतिशत कम है। हालांकि, राज्य में बारिश की औसत कमी से जिलावार स्थिति की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। नासिक में औसत से अधिक बारिश हुई, जबकि सोलापुर, बीड, हिंगोली, जालना, अहिल्यानगर, धाराशिव, अकोला और अमरावती में बारिश की भारी कमी दर्ज की गई।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की 2026 की मानसून समीक्षा के अनुसार, इस सीजन में बारिश का स्वरूप मानसून के सक्रिय रहने और बीच-बीच में कमजोर पड़ने वाले चरणों से तय हुआ। इसलिए सिर्फ पूरे सीजन की कुल बारिश देखना काफी नहीं है। यह भी समझना जरूरी है कि बारिश कब और कितनी हुई, निम्न दाब प्रणालियां कितनी बार बनीं, उनका मार्ग क्या रहा और मानसून ट्रफ की स्थिति कैसी रही।
जून में मानसून की कमजोर शुरुआत
2026 में मानसून की शुरुआत महाराष्ट्र के लिए खास अनुकूल नहीं रही। जून में देश के मध्य भाग में मानसून की सक्रियता उम्मीद के मुताबिक नहीं थी। IMD की अंतिम समीक्षा के अनुसार, जून 2026 में देशभर में बारिश दीर्घकालिक औसत की केवल 65 प्रतिशत रही।
इसकी एक प्रमुख वजह जून में बंगाल की खाड़ी में निम्न दाब प्रणालियों का नहीं बनना था। IMD के अवलोकन के अनुसार, जून में एक भी Low Pressure Area नहीं बना। ऐसी प्रणालियां मध्य भारत तक बड़े पैमाने पर नमी पहुंचाने और बारिश कराने में अहम भूमिका निभाती हैं। इनके नहीं बनने से बारिश की कमी रही।
जुलाई में स्थिति में बड़ा बदलाव
जून में बारिश की कमी के बाद जुलाई में मानसून की सक्रियता काफी बढ़ गई।
इस दौरान बंगाल की खाड़ी में बनी निम्न दाब प्रणालियों और उनके मध्य भारत की ओर बढ़ने से बड़े क्षेत्र में बारिश हुई। IMD की जानकारी के अनुसार, जुलाई में मध्य भारत (Central India) में बारिश दीर्घकालिक औसत की लगभग 133 प्रतिशत रही।
जुलाई में Low Pressure Systems का प्रभाव भी उल्लेखनीय रहा। इन प्रणालियों के कारण मानसून ट्रफ सक्रिय रहा और मध्य भारत के साथ-साथ महाराष्ट्र के कई हिस्सों में बारिश बढ़ी।
हालांकि, जुलाई में हुई अच्छी बारिश जून की कमी की भरपाई पूरे महाराष्ट्र में समान रूप से नहीं कर सकी।
अगस्त में फिर घट गई मानसून की सक्रियता
जुलाई के बाद अगस्त में मानसून की सक्रियता फिर कमजोर पड़ गई।
IMD की अंतिम मानसून समीक्षा के अनुसार, अगस्त में मध्य भारत में बारिश दीर्घकालिक औसत की 84 प्रतिशत और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत (South Peninsular India) में लगभग 73 प्रतिशत रही।
इसके चलते महाराष्ट्र के उन कई जिलों में पूरे सीजन की बारिश की कमी बनी रही, जहां पहले से कम बारिश दर्ज की गई थी। इसका असर खास तौर पर मराठवाड़ा और विदर्भ के जिलों में दिखाई दिया।
सितंबर के अंत में सक्रिय बारिश से कुछ भरपाई
सितंबर के अंतिम चरण में मानसून फिर सक्रिय हुआ। विभिन्न मौसमी प्रणालियों (Synoptic Systems) और उनसे जुड़े नमी के जमाव व परिवहन (Moisture Convergence) के कारण महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में अच्छी बारिश हुई।
IMD की जानकारी के अनुसार, सितंबर के अंतिम सप्ताह में हुई सक्रिय बारिश से सीजन के अंत तक कुल बारिश की कमी कुछ हद तक घटी।
फिर भी, जून और अगस्त में बारिश कम होने के कारण कई जिलों में पूरे मानसून सीजन की बारिश औसत से नीचे ही रही।
महाराष्ट्र के चारों मौसम संभागों में बारिश का अंतर
महाराष्ट्र के चारों मौसम संभागों में बारिश का वितरण अलग-अलग रहा। कोंकण-गोवा में औसतन 2,870.6 मिमी बारिश के मुकाबले 2,443 मिमी बारिश हुई, जो 15 प्रतिशत कम है। मध्य महाराष्ट्र में औसत 677.4 मिमी के मुकाबले 633.4 मिमी बारिश दर्ज की गई, यानी 7 प्रतिशत की कमी रही।
वहीं, मराठवाड़ा में औसत 642.8 मिमी के मुकाबले सिर्फ 389.6 मिमी बारिश हुई, जो 39 प्रतिशत कम है। विदर्भ में औसत 937.3 मिमी के मुकाबले 687.3 मिमी बारिश दर्ज की गई, यानी 27 प्रतिशत की कमी रही। इस तरह मराठवाड़ा में बारिश की सबसे ज्यादा कमी और मध्य महाराष्ट्र में सबसे कम कमी दर्ज की गई।
जिलावार बारिश की तस्वीर बेहद असमान
महाराष्ट्र में जिलावार बारिश के आंकड़ों में भी बड़ा अंतर दिखाई देता है। कुछ जिलों में औसत से अधिक बारिश हुई, जबकि कई जिलों में भारी कमी दर्ज की गई।
औसत से अधिक बारिश वाले जिले:
- नासिक: लगभग 33% ज्यादा
- पुणे: लगभग 13% ज्यादा
- पालघर: लगभग 18% ज्यादा
- सातारा: लगभग 15% ज्यादा
- मुंबई उपनगर: लगभग 10% ज्यादा
इसके विपरीत, कई जिलों में बारिश औसत से काफी कम रही।
बारिश में भारी कमी वाले जिले:
- सोलापुर: लगभग 59% कम
- बीड: लगभग 49% कम
- हिंगोली: लगभग 49% कम
- जालना: लगभग 48% कम
- अहिल्यानगर: लगभग 47% कम
- धाराशिव: लगभग 45% कम
- अमरावती: लगभग 43% कम
- अकोला: लगभग 42% कम
ये आंकड़े बताते हैं कि राज्य में बारिश की कमी हर जिले में एक जैसी नहीं रही। कुछ जिलों में औसत से ज्यादा बारिश हुई, जबकि कुछ में बहुत कम बारिश दर्ज की गई।
पश्चिम महाराष्ट्र में बारिश के दो अलग-अलग छोर
पश्चिम महाराष्ट्र के आंकड़े खास तौर पर ध्यान खींचते हैं। इस क्षेत्र के अलग-अलग जिलों में बारिश का अंतर काफी बड़ा रहा।
नासिक में औसत से लगभग 33 प्रतिशत ज्यादा, पुणे में 13 प्रतिशत ज्यादा और सातारा में 15 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई। इसके विपरीत, कोल्हापुर में लगभग 15 प्रतिशत और सांगली में 24 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। सोलापुर में स्थिति सबसे गंभीर रही, जहां बारिश औसत से करीब 59 प्रतिशत कम रही।
सांगली: 24% कम बारिश
सांगली जिले में पूरे मानसून सीजन के दौरान बारिश औसत से लगभग 24 प्रतिशत कम रही।
कोल्हापुर: 15% कम बारिश
पश्चिमी घाट के कारण कोल्हापुर में कुल बारिश की मात्रा काफी रहती है। इसके बावजूद, 2026 में यहां बारिश दीर्घकालिक औसत से लगभग 15 प्रतिशत कम रही।
सोलापुर: 59% कम बारिश
सोलापुर में बारिश की कमी बेहद ज्यादा रही। इसके पीछे पश्चिमी घाट की वृष्टि-छाया (Rain Shadow) का प्रभाव, बारिश कराने वाली मौसमी प्रणालियों के मार्ग में अंतर और नमी की उपलब्धता जैसे कारक भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, इन कारकों के योगदान को अलग-अलग तय करने के लिए विस्तृत स्थानीय मौसम संबंधी विश्लेषण जरूरी है।
मराठवाड़ा में बारिश की कमी सबसे ज्यादा
मराठवाड़ा की स्थिति खास तौर पर चिंताजनक रही। इस क्षेत्र के कई जिलों में पूरे मानसून सीजन के दौरान बारिश औसत से काफी कम दर्ज की गई।
जिलावार आंकड़ों के अनुसार:
- बीड: 49% कम
- हिंगोली: 49% कम
- जालना: 48% कम
- अहिल्यानगर: 47% कम
- धाराशिव: 45% कम
- परभणी: 40% कम
- लातूर: 39% कम
- नांदेड़: 35% कम
इस क्षेत्र के कई जिलों में बारिश की कमी 35 से 50 प्रतिशत के आसपास रही। इससे साफ है कि मराठवाड़ा में मानसून की बारिश का संकट राज्य के औसत आंकड़े से कहीं ज्यादा गंभीर रहा।
विदर्भ में भी बारिश का वितरण एक जैसा नहीं
विदर्भ में भी बारिश का वितरण सभी जिलों में एक जैसा नहीं रहा। पूर्वी विदर्भ के कुछ जिले अपेक्षाकृत सामान्य स्थिति में रहे, जबकि पश्चिमी विदर्भ के कुछ जिलों में बारिश की बड़ी कमी दर्ज की गई।
खास तौर पर:
- अकोला: 42% कम
- अमरावती: 43% कम
वहीं, गोंदिया में बारिश की स्थिति अपेक्षाकृत सामान्य रही।
इससे एक बार फिर स्पष्ट होता है कि किसी पूरे मौसम संभाग की औसत बारिश से उसके हर जिले की स्थिति का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
अल नीनो कितना जिम्मेदार?
मानसून की बारिश में कमी का विश्लेषण करते समय अल नीनो (El Niño) एक महत्वपूर्ण जलवायु कारक हो सकता है। लेकिन महाराष्ट्र में बारिश की 19 प्रतिशत या कुछ जिलों में इससे भी ज्यादा कमी के लिए सिर्फ अल नीनो को जिम्मेदार ठहराना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।
बारिश पर एक साथ कई कारकों का असर पड़ता है। इनमें ENSO/El Niño, हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD), मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO), समुद्र की सतह का तापमान, मानसून ट्रफ की स्थिति, निम्न दाब प्रणालियां, नमी का परिवहन, पहाड़ों का प्रभाव और स्थानीय स्तर पर बादलों का बनना शामिल हैं।
इन सभी कारकों के आपसी प्रभाव से किसी क्षेत्र में बारिश की मात्रा और उसका वितरण तय होता है।
इसलिए ज्यादा सटीक वैज्ञानिक निष्कर्ष यह होगा कि 2026 में बड़े पैमाने की समुद्र-वायुमंडलीय स्थितियों और ENSO से जुड़े प्रभावों के साथ-साथ मानसून से जुड़ी मौसमी प्रणालियों की आवृत्ति और उनके मार्ग में बदलाव ने बारिश के असमान वितरण में भूमिका निभाई हो सकती है। हालांकि, किसी एक कारक की भूमिका तय करने के लिए अलग से वैज्ञानिक विश्लेषण जरूरी है।
मौसमी बारिश और खेती की स्थिति एक जैसी नहीं
किसी जिले में पूरे मानसून सीजन की बारिश 20 से 30 प्रतिशत कम रही हो, तो भी सिर्फ इस आंकड़े के आधार पर वहां खेती की स्थिति का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।
खेती पर बारिश के कई पहलुओं का असर पड़ता है, जैसे:
- पूरे सीजन में हुई कुल बारिश
- बारिश का समय और उसका वितरण
- बारिश होने की घटनाओं की आवृत्ति
- लगातार सूखे दिनों की संख्या
- बारिश की तीव्रता
- मिट्टी में उपलब्ध नमी
- फसल की वृद्धि का चरण
- जलाशयों में पानी की स्थिति
उदाहरण के लिए, अगर कुछ ही दिनों में बहुत ज्यादा बारिश हो जाए, तो पूरे सीजन की कुल बारिश का आंकड़ा बढ़ सकता है। लेकिन इसके बाद लंबे समय तक बारिश न होने से फसलों में पानी की कमी पैदा हो सकती है। इसलिए खेती पर मानसून के असर को समझने के लिए कुल बारिश के साथ-साथ उसके समय और वितरण को देखना भी जरूरी है।
मौसम-वैज्ञानिक निष्कर्ष
महाराष्ट्र में 2026 के मानसून को एक वाक्य में इस तरह समझा जा सकता है—कमजोर शुरुआत, जुलाई में जोरदार सक्रियता, अगस्त में फिर बारिश की कमी और सितंबर के अंत में दोबारा सक्रिय बारिश। इन अलग-अलग चरणों के कारण राज्य में बारिश का वितरण बेहद असमान रहा।
राज्य में औसत से करीब 19 प्रतिशत कम बारिश होना एक अहम संकेतक है, लेकिन इसके पीछे की तस्वीर कहीं ज्यादा जटिल है। नासिक में लगभग 33 प्रतिशत ज्यादा बारिश और सोलापुर में करीब 59 प्रतिशत कम बारिश, जबकि मराठवाड़ा के कई जिलों में 40 से 50 प्रतिशत तक की कमी, इस अंतर को स्पष्ट करते हैं।
IMD की 30 सितंबर की अंतिम समीक्षा के अनुसार, 2026 के मानसून में बारिश के सक्रिय और कमजोर चरणों के बीच बड़ा अंतर रहा। निम्न दाब प्रणालियों की भूमिका और जून, जुलाई, अगस्त तथा सितंबर के बीच बारिश में आए उतार-चढ़ाव को समझना महाराष्ट्र में मानसून के असमान वितरण की तस्वीर जानने के लिए जरूरी है।





