भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता (FTA) 20 अक्टूबर से लागू हो गया है। इस समझौते से भारतीय किसानों और कृषि उत्पादों का कारोबार करने वालों के लिए न्यूजीलैंड के बाजार में नए अवसर खुल सकते हैं। फल-सब्जियां, चाय, कॉफी, मसाले, अनाज और प्रोसेस्ड फूड जैसे उत्पादों को न्यूजीलैंड में बिना आयात शुल्क के भेजने का रास्ता साफ हुआ है। इससे भारतीय उत्पाद वहां के बाजार में दूसरे देशों के उत्पादों के मुकाबले ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं।
हालांकि, इसका फायदा किसानों को सीधे कितना मिलेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि निर्यातक उनसे किस कीमत पर उपज खरीदते हैं और भारतीय उत्पादों की मांग कितनी बढ़ती है।
किन कृषि उत्पादों को मिलेगा फायदा?
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के मुताबिक, न्यूजीलैंड भारत से आने वाले सभी उत्पादों को 100 फीसदी शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच देगा। यानी भारतीय सामान पर वहां लगने वाला आयात शुल्क खत्म हो जाएगा। इससे कृषि और खाद्य उत्पादों के निर्यातकों की लागत कम हो सकती है। इस समझौते से फल-सब्जियों, हल्दी, मिर्च समेत दूसरे मसालों, चाय, कॉफी, अनाज और प्रोसेस्ड फूड के निर्यात को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। पहले न्यूजीलैंड में भारतीय उत्पादों पर 10 फीसदी तक आयात शुल्क लगता था। अब शुल्क खत्म होने से भारतीय उत्पाद वहां के बाजार में दूसरे देशों के उत्पादों के मुकाबले ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं। हालांकि, निर्यात बढ़ने के लिए उत्पादों की गुणवत्ता, बाजार में मांग और दूसरे देशों से मिलने वाली प्रतिस्पर्धा भी अहम होगी।
किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए क्या किया गया?
इस समझौते में भारत ने कुछ कृषि उत्पादों को आयात शुल्क में छूट देने से बाहर रखा है, ताकि न्यूजीलैंड से आने वाले सामान के कारण घरेलू किसानों और उद्योगों पर दबाव न बढ़े।
इनमें दूध, दही, पनीर और दूसरे डेयरी उत्पादों के अलावा प्याज, चना, मटर, मक्का और चीनी जैसे उत्पाद शामिल हैं। यानी इन उत्पादों को समझौते के तहत सामान्य शुल्क-मुक्त सुविधा नहीं दी गई है।
भारत ने न्यूजीलैंड के सेब, कीवी और मनुका शहद के आयात पर भी कुछ शर्तें रखी हैं। इनके लिए तय मात्रा तक आयात पर शुल्क संबंधी रियायतें, न्यूनतम आयात मूल्य और अन्य सुरक्षा उपायों का प्रावधान किया गया है। इसका मकसद विदेशी उत्पादों को भारतीय बाजार में जगह देने के साथ घरेलू किसानों के हितों का ध्यान रखना है।
सेब, कीवी और शहद की खेती में भी सहयोग
समझौते में सिर्फ व्यापार ही नहीं, बल्कि खेती में सहयोग बढ़ाने की भी बात है। भारत और न्यूजीलैंड सेब, कीवी और शहद के उत्पादन से जुड़ी कार्ययोजनाओं पर मिलकर काम करेंगे।
इससे भारत में इन उत्पादों की पैदावार और गुणवत्ता सुधारने के लिए तकनीक और विशेषज्ञता साझा करने के अवसर मिल सकते हैं। हालांकि, किसानों को इसका कितना फायदा होगा, यह आने वाले समय में दोनों देशों के बीच होने वाले सहयोग और योजनाओं के क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
2030 तक व्यापार बढ़ाने का लक्ष्य
भारत और न्यूजीलैंड ने 2030 तक वस्तुओं और सेवाओं के द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाकर करीब 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर यानी लगभग 35,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
समझौते से कृषि उत्पादों के अलावा कपड़ा, दवा, इंजीनियरिंग सामान और समुद्री उत्पादों के निर्यात को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। न्यूजीलैंड ने भारतीय सेवा क्षेत्र के लिए भी कई क्षेत्रों में अवसर देने पर सहमति जताई है।
किसानों के लिए इसका क्या मतलब है?
इस समझौते से भारतीय कृषि उत्पादों के लिए विदेशी बाजार में पहुंच आसान हो सकती है। लेकिन सिर्फ निर्यात शुल्क खत्म होने से किसानों की आमदनी अपने आप नहीं बढ़ेगी। इसके लिए जरूरी है कि किसानों की उपज की खरीद बढ़े, उन्हें सही कीमत मिले और उनकी फसल निर्यात के जरूरी गुणवत्ता मानकों पर खरी उतरे।
किसानों को इसका वास्तविक फायदा तभी मिलेगा, जब निर्यातक उनसे सीधे या दूसरे माध्यमों से ज्यादा उपज खरीदेंगे और उस बढ़ी हुई मांग का लाभ किसानों तक पहुंचेगा। फिलहाल यह समझौता भारतीय कृषि उत्पादों के लिए न्यूजीलैंड में नए बाजार अवसर खोलता है, लेकिन इन अवसरों को किसानों की बेहतर आमदनी में बदलना अगली बड़ी चुनौती होगी।


