भारत में कपास का उत्पादन घटने की आशंका है, वहीं कपड़ा उद्योग को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए ज्यादा कपास की जरूरत है। ऐसे में सरकार कपास के आयात पर कस्टम ड्यूटी में मिलने वाली छूट को दिसंबर के अंत तक बढ़ा सकती है। इससे कपड़ा मिलों की लागत कम करने और घरेलू बाजार में कपास की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, आयात बढ़ने से किसानों को अपनी उपज के कम दाम मिलने का खतरा भी है।
अक्टूबर में खत्म हो रही है ड्यूटी में छूट
भारत सरकार ने 1 जून से 31 अक्टूबर तक पांच महीने के लिए कपास के आयात पर लगने वाली 11 फीसदी कस्टम ड्यूटी हटा दी थी। अब इस छूट को दिसंबर के अंत तक बढ़ाने की तैयारी है। मामले से जुड़े तीन सरकारी और उद्योग सूत्रों के मुताबिक, अलग-अलग मंत्रालयों के बीच चर्चा पूरी हो चुकी है और सरकार जल्द ही इस बारे में आदेश जारी कर सकती है।
वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष के शुरुआती छह महीनों यानी अप्रैल से सितंबर के दौरान भारत का कपास आयात पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 63 फीसदी बढ़कर 1.1 अरब डॉलर पहुंच गया।
9,000 रुपये के पार पहुंची कपास की कीमत
आमतौर पर अक्टूबर में नई फसल की आवक शुरू होने के बाद कपास की कीमतें कम होने लगती हैं। लेकिन इस साल कमजोर मानसून और उत्पादन घटने की आशंका के चलते कीमतों में ज्यादा गिरावट नहीं आई है। घरेलू बाजार में कपास की कीमत 9,000 रुपये प्रति 100 किलो से ऊपर बनी हुई है, जबकि नए सीजन के लिए सरकार का तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 8,717 रुपये है।
जानकारों का मानना है कि कपास के आयात में बढ़ोतरी से घरेलू बाजार में कीमतों को काबू करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इससे किसानों को अपनी फसल के कम दाम मिलने की आशंका भी है।
मांग से कम रह सकता है कपास का उत्पादन
व्यापार जगत के अनुमानों के मुताबिक, साल 2026-27 में भारत में कपास का उत्पादन 2.9 करोड़ गांठ से भी कम रह सकता है, जबकि देश में इसकी मांग 3.4 करोड़ गांठ से ज्यादा रहने का अनुमान है। कपास का स्टॉक भी पिछले पांच साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंचने की आशंका है। उत्पादन और मांग के बीच इस अंतर के कारण कपड़ा मिलों को कपास की पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने में मुश्किल हो सकती है।
अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया से बढ़ सकता है आयात
अगर सरकार ड्यूटी में छूट की अवधि बढ़ाती है, तो भारत अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से ज्यादा कपास आयात कर सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास की ऊंची कीमतें, माल ढुलाई का खर्च और रुपये की कमजोरी आयात को महंगा बना सकते हैं।
कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (CITI) का कहना है कि आयात शुल्क को लंबे समय तक हटाने से कपड़ा निर्माताओं की लागत कम हो सकती है। इससे भारतीय कपड़ा उद्योग को वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से मुकाबला करने में मदद मिलेगी।





