देश में दालों की कीमतों को काबू में रखने और बाजार में पर्याप्त सप्लाई बनाए रखने के लिए सरकार कुछ दालों पर इंपोर्ट ड्यूटी घटाने पर विचार कर रही है। कमजोर मानसून की वजह से इस साल घरेलू उत्पादन कम रहने की चिंता है, ऐसे में सरकार आयात के जरिए दालों की उपलब्धता बढ़ाना चाहती है।
सूत्रों के मुताबिक, सरकार मसूर और पीली मटर पर आयात शुल्क कम कर सकती है, जबकि चने को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा। फिलहाल भारत में लाल मसूर और चने पर 10% और पीली मटर पर 30% आयात शुल्क है। वहीं अरहर और उड़द के आयात पर मार्च 2027 तक शुल्क नहीं लिया जा रहा है।
भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और आयातक है। देश में दालों की मांग और उत्पादन के बीच अंतर को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में दालें विदेशों से मंगाई जाती हैं। 2024-25 में भारत ने करीब 7.3 मिलियन टन दालों का आयात किया था, जबकि घरेलू उत्पादन 25.7 मिलियन टन रहा।
इस साल चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि दालों की खेती मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर रहती है। जून से सितंबर के मानसून के दौरान कई प्रमुख दाल उत्पादक राज्यों में सामान्य से 30% तक कम बारिश हुई है। इससे इस साल दालों के उत्पादन में बड़ी गिरावट की आशंका है।
रॉयटर्स की एक खबर के मुताबिक सरकार चने पर आयात शुल्क बनाए रखकर किसानों को अक्टूबर से चने की ज्यादा बुवाई के लिए प्रोत्साहित करना चाहती है। वहीं त्योहारी सीजन में दालों की मांग बढ़ने से कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है।
दालों की महंगाई पहले से ही चिंता का विषय बनी हुई है। अगस्त में अरहर की कीमतों में सालाना आधार पर 5.6% और उड़द की कीमतों में 7.4% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ऐसे में आयात शुल्क में कटौती से बाजार में दालों की सप्लाई बढ़ाने और कीमतों को काबू में रखने में मदद मिल सकती है।





