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भारत में छोटे किसानों के लिए नई उम्मीद 'Agroforestry', मुनाफा और पर्यावरण दोनों का संतुलन

भारत के किसानों के लिए नया एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल तैयार किया गया है, जिसमें एक ही खेत में पेड़, फसलें और पशु पाले जाते हैं। इससे किसान सालभर कमाई कर सकते हैं। शुरुआती सालों में फसलों और पशुपालन से, और ब

Pooja Rai

Pooja Rai·03 Nov 2025· 3 min read

भारत में छोटे किसानों के लिए नई उम्मीद 'Agroforestry', मुनाफा और पर्यावरण दोनों का संतुलन

भारत में छोटे किसानों के लिए नई उम्मीद 'Agroforestry', मुनाफा और पर्यावरण दोनों का संतुलन

भारत के किसानों के लिए नया एग्रोफॉरेस्ट्री मॉडल तैयार किया गया है, जिसमें एक ही खेत में पेड़, फसलें और पशु पाले जाते हैं। इससे किसान सालभर कमाई कर सकते हैं। शुरुआती सालों में फसलों और पशुपालन से, और बाद में फलों व लकड़ी के पेड़ों से। यह मॉडल मिट्टी और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद है, बस किसानों को इसके लिए ट्रेनिंग और सरकारी मदद की जरूरत होगी।

भारत में छोटे और सीमांत किसान अब एक नए मोड़ पर हैं। पहले जहाँ किसान एक ही फसल (मोनोक्रॉपिंग) पर निर्भर रहते थे, अब बदलते मौसम, बढ़ती लागत और अनिश्चित बाजार के कारण यह तरीका टिक नहीं पा रहा है। ऐसे में खेती को टिकाऊ और मुनाफेदार बनाने के लिए एग्रोफॉरेस्ट्री यानी “पेड़, फसल और पशुधन को साथ में पालने का सिस्टम” एक नया समाधान बनकर उभर रही है।

महाराष्ट्र के कोल्हापुर से नई शुरुआत
पश्चिमी घाट एग्रोफॉरेस्ट्री लैब ने महाराष्ट्र के गुडेवाडी गांव में एक एकड़ जमीन पर इस मॉडल का सफल प्रयोग किया है। इस मॉडल में अलग-अलग स्तर पर फसलें और पेड़ लगाए जाते हैं, जिससे सालभर कमाई होती रहती है।
पहले स्तर में रागी, मक्का, शकरकंद और मूंगफली जैसी जल्दी तैयार होने वाली फसलें लगाई जाती हैं। इनसे किसान को हर साल लगभग ₹45,000 से ₹55,000 की कमाई होती है।
इसके साथ अगर किसान भैंस और बकरियां पालता है, तो दूध, गोबर और मांस से करीब ₹40,000 से ₹50,000 की अतिरिक्त आमदनी होती है। यानी पहले ही साल से नियमित आय शुरू हो जाती है।

पेड़ों से बढ़ती कमाई
दूसरे स्तर में आम, काजू और नारियल जैसे फलदार पेड़ लगाए जाते हैं। ये तीसरे से पांचवें साल तक फल देना शुरू करते हैं, जिससे हर साल ₹80,000 से ₹90,000 तक की आय हो सकती है।

लकड़ी के पेड़, लंबे समय की संपत्ति
इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा है लंबे समय की कमाई। इसमें सागौन (टीक) और शीशम (रोज़वुड) जैसे लकड़ी वाले पेड़ लगाए जाते हैं, जो 15 साल बाद ₹5 लाख से ₹12 लाख तक की कमाई दे सकते हैं। इसे “जैविक बचत (biological savings)” कहा जा सकता है, जो समय के साथ खुद-ब-खुद बढ़ती रहती है।

ये भी पढ़ें - भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस 2025: ‘मेड इन इंडिया राइस’ को मिला नया वैश्विक पहचान

पर्यावरण को भी मिलता फायदा
यह मॉडल केवल मुनाफा ही नहीं देता, बल्कि पर्यावरण को भी सुधारता है। पेड़ों और फसलों के मिश्रण से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, पानी की पकड़ बेहतर होती है और जैव विविधता में भी सुधार होता है। साथ ही, रासायनिक खाद की जरूरत घट जाती है। आने वाले समय में किसान कार्बन क्रेडिट बाजार से भी अतिरिक्त आय कमा सकते हैं।

किसानों को चाहिए संस्थागत मदद
यह मॉडल अलग-अलग जलवायु क्षेत्रों में अपनाया जा सकता है। पश्चिमी घाट जैसे अधिक वर्षा वाले इलाकों में यह सबसे कारगर है, लेकिन सूखे इलाकों में भी सूखा-सहने वाली फसलें और पेड़ लगाकर इसे सफल बनाया जा सकता है।
हालाँकि, इसे बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए किसानों को ट्रेनिंग, कर्ज, बाजार से जुड़ाव और लकड़ी परिवहन के नियमों में सुधार जैसी संस्थागत मदद की जरूरत होगी।

गुडेवाडी का यह मॉडल दिखाता है कि अगर वैज्ञानिक योजना और समझदारी से खेती की जाए, तो छोटे किसान भी कम जोखिम और ज्यादा मुनाफे वाली खेती कर सकते हैं, जो आर्थिक रूप से स्थिर और पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद है।

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