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प्राकृतिक खेती की राह में कैसे आगे बढ़ा हिमाचल प्रदेश?

न्यूज़ पोटली के लिए रोहित परासर की रिपोर्ट किसान व बागवानों के व्यापक कल्याण एवं समृद्धि के लिए खेती की लागत को कम करने, आय को बढ़ाने, मानव एवं पर्यावरण पर रासायनिक खेती के पड़ने वाले दुष्प्रभावों से

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Rohit· Correspondent

15 अगस्त 2024· 10 min read

प्राकृतिक खेती की राह में कैसे आगे बढ़ा हिमाचल प्रदेश?

प्राकृतिक खेती की राह में कैसे आगे बढ़ा हिमाचल प्रदेश?

न्यूज़ पोटली के लिए रोहित परासर की रिपोर्ट

किसान व बागवानों के व्यापक कल्याण एवं समृद्धि के लिए खेती की लागत को कम करने, आय को बढ़ाने, मानव एवं पर्यावरण पर रासायनिक खेती के पड़ने वाले दुष्प्रभावों से बचाने एवं पर्यावरण व बदलते जलवायु परिवेश के समरूप कृषि का मार्ग प्रशस्त करने के लिए 5 वर्ष पहले प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना को शुरू किया गया था. इस योजना के तहत जैविक खेती सहित अन्य सभी रसायनरहित खेती विधियों को भी प्राकृतिक खेती के दायरे में लाया जा रहा है.सरकार का दावा है कि पिछले 5 सालों में प्राकृतिक खेती के सफल परिणाम देखने को मिल रहे हैं और अभी तक प्रदेश की लगभग सभी पंचायतों में इसके मॉडल खड़े हो गए हैं.

वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, अभी तक 1,92,707 किसान-बागवान परिवारों ने इस खेती विधि को पूर्ण या आंशिक भूमि पर अपना लिया है. प्रदेश की 99.3 प्रतिशत पंचायतों में यह विधि पहुंच बना चुकी है और 4 लाख 2 हजार बीघा (32,198 हैक्टेयर) से अधिक भूमि पर इस विधि से खेती-बागवानी की जा रही है.

क्या है प्राकृतिक खेती?

प्राकृतिक खेती कृषि-बागवानी की एक ऐसी अवधारणा है जो रसायनों के प्रयोग को हतोत्साहित कर, देसी गाय के गोबर-मूत्र और स्थानीय वनस्पतियों पर आधारित आदानों के प्रयोग का अनुमोदन करती है। कम लागत और पर्यावरण के साथ सद्भाव बनाकर बेहतर उत्पादन देने वाली यह खेती तकनीक किसान की बाजार पर निर्भरता को कम करती है।

इस खेती का मूलमंत्र हैः गांव का पैसा गांव में।

प्राकृतिक खेती के चार स्तंभ हैं-

● बीजामृत- सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा बीजोपचार

● जीवामृत एवं घनजीवामृत- खाद का सर्वोत्तम विकल्प जो लाभदायक जीवाणुओं को बढ़ाता है

● आच्छादन- फसल अवशेष से मिट्टी की सतह को ढकना

● वाफ्सा- मिट्टी में हवा और नमी को बरकरार रखना

इनको अपनाकर किसान खेती लागत को कम कर सकते हैं। इस विधि के तहत फसल विविधिकरण पर जोर दिया जाता है और मुख्य फसल के साथ फसल बढ़वार के लिए भूमि में नाइट्रोजन की उपलब्धता बनाए रखने हेतु दलहनी फसलें लगाने पर बल दिया जाता है। देसी गाय के गोबर और मूत्र पर आधारित विभिन्न आदानों के प्रयोग से देसी केंचुओं की संख्या में वृद्धि कर भूमि की जल धारण करने की शक्ति को बढ़ाया जाता है, जो अंततः भूमि की उर्वरा शक्ति को पुनर्जीवित करता है। फसलों को बीमारियों से बचाने के लिए स्थानीय वनस्पतियों के साथ लहसुन और हरी मिर्च का प्रयोग किया जाता है।

अन्य योजनाओं के साथ सम्मिश्रण

प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना को केंद्र सरकार की परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY), भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (BPKP) एवं आतमा परियोजना के साथ चलाया जा रहा है। इसके अलावा केंद्र सरकार की ओर से प्राकृतिक खेती मिशन को शुरू किया गया है। इस मिशन के तहत भी प्रदेश में चल रही प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिलेगा।

‘प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान’ योजना का कार्यान्वयन

● शीर्ष समिति (Apex Committee)- इस योजना का मार्गदर्शन प्रदेश स्तर पर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में गठित शीर्ष समिति (Apex Committee) कर रही है।

● विशेष कार्यबल (State Level Task Force)- योजना का संचालन एवं निगरानी प्रदेश स्तर पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित विशेष कार्यबल; (State Level Task Force) कर रहा है।

● राज्य परियोजना कार्यान्वयन इकाई (State Project Implementing Unit)- योजना के कार्यान्वयन और निगरानी के लिए राज्य परियोजना निदेशक की अध्यक्षता में राज्य परियोजना कार्यान्वयन इकाई का गठन किया गया है। यह इकाई प्रदेश में कृषि विभाग के माध्यम से इस योजना का कार्यान्वयन कर रही है।

● जिला स्तर- जिला स्तर पर इस योजना को आतमा परियोजना के अंर्तगत चलाया जा रहा है, जिसमें जिले में तीन अधिकारी व खंड स्तर पर 3 खंड तकनीकी प्रबंधक और सहायक तकनीकी प्रबंधक शामिल हैं।

इस योजना के अंतर्गत किसानों में क्षमता निर्माण कर लगातार उनसे संपर्क बनाए रखने, निगरानी और नियमित सलाह एवं सहयोग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। किसानों को यह खेती विधि आसानी से समझ आ सके इसके लिए खेती विधि से संबंधित साहित्य भी राज्य परियोजना कार्यान्वयन इकाई द्वारा निशुल्क मुहैया करवाया जा रहा है ताकि इस पहाड़ी प्रदेश के छोटे एवं सीमांत किसानों के दीर्घकालिक कल्याण को सुनिश्चित किया जा सके।

प्राकृतिक खेती क्रियान्वयन की कार्यनीति

प्राकृतिक खेती के क्रियान्वयन के लिए 4 स्तरीय रणनीति अपनाई जा रही है।

प्रथम स्तर पर किसान-बागवानों का संवेदीकरण किया जाता है। इसके लिए राज्य एवं जिला स्तर पर बड़े स्तर के संवेदीकरण कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है जिसमें इस खेती के जनक पद्मश्री सुभाष पालेकर जी द्वारा प्रतिपादित प्राकृतिक खेती की अवधारणा के बारे में बताया जाता है। विभिन्न जिले ‘किसान गोष्ठियों’ के माध्यम से संवेदीकरण करते हैं।

द्वितीय स्तर पर किसान-बागवानों के लिए प्राकृतिक खेती पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जहां किसानों को प्राकृतिक खेती पर जानकारी के साथ विभिन्न घटकों को बनाना भी सिखाया जाता है। ब्लॉक स्तर के अधिकारी पंचायत स्तर पर 2 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करते हैं। हर प्रशिक्षण कार्यक्रम में 30 प्रतिभागी किसानों को प्रशिक्षित किया जाता है।

तृतीय स्तर में प्रशिक्षित किसानों को उत्कृष्ट प्राकृतिक खेती मॉडल पर भ्रमण करवाया जाता है ताकि वह इस खेती के परिणामों को स्वयं देख सकें और इसे अपनाने के लिए प्रेरित हो सकें।

चतुर्थ स्तर पर किसान-बागवान प्राकृतिक खेती को अपनाना शुरू करते हैं। इस स्तर पर कृषि अधिकारी प्राकृतिक खेती से जुड़े नए किसान पर विशेष ध्यान देते हैं एवं खेती के विविध चरणों के बारे में उसका मार्गदर्शन करते हैं।

प्राकृतिक खेती पर अनुदान

किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रति प्रोत्साहित करने हेतु राज्य सरकार विभिन्न अनुदान दे रही है।

● प्राकृतिक खेती की आधार भारतीय नस्ल की गाय की खरीद पर 50 फीसदी अनुदान (अधिकतम 25 हजार तक) और 5 हजार रूपये यातायात शुल्क के तौर पर दिया जा रहा है।

● गौशाला के फर्श को पक्का कर गोमूत्र एकत्रीकरण के लिए गड्ढ़ा बनाने पर 8 हजार रूपये

● आदान बनाने के लिए ड्रम लेने के पर 2,250 रूपये

● संसाधन भंडार खोलने हेतु 10,000 रूपये प्रति परिवार दिए जा रहे हैं।

योजना की विशेष उपलब्धियां

‘प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान’ योजना को देशभर में सराहना मिल रही है। नीति आयोग ने देशभर में प्राकृतिक खेती के क्रियान्वयन हेतु हिमाचल प्रदेश के मॉडल को आधार बनाया है। हिमाचल प्राकृतिक खेती को शुरू कर रहे देश के अलग-अलग राज्यों का भी सहयोग कर रहा है। केंद्र सरकार की ओर से भी प्राकृतिक खेती मिशन पर काम किया जा रहा है। इस मिशन के तहत देश भर में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए 1500 करोड़ रूपये के बजट जारी किया गया है।

हिमाचल के किसान-बागवानों द्वारा अपनाई जा रही प्राकृतिक खेती को देखते हुए विभिन्न मंचों पर राष्ट्रपति, माननीय प्रधानमंत्री एवं केंद्रीय मंत्रियों ने इस योजना की सराहना की है।

● भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति को लागू करने हेतु प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना का मॉडल अपनाया गया।

● प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (National Mission on Natural Farming) बनाने के लिए भी हिमाचल के सुझावों को सम्मिलित किया गया।

● प्राकृतिक खेती के बारे में जानने के लिए पड़ोसी राज्यों उत्तराखंड, गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं केंद्र शासित जम्मू कश्मीर के किसानों-अधिकारियों एवं कृषि विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा हिमाचल के विभिन्न स्थानों का दौरा किया गया है।

योजना के तहत नए प्रयास

नवोन्वेषी स्व प्रमाणीकरण प्रणाली-Innovative Self Certification System- योजना के अधीन दुनियाभर में मान्य राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने वाली एक अनूठी स्व प्रमाणीकरण प्रणाली तैयार की गई है। यह किसान एवं उपभोक्ता के बीच पारदर्शिता एवं ट्रेसेबिलिटी सुनिश्चित करेगी। इस वेरीफिकेशन से बाजार में उत्पाद बेच रहे प्राकृतिक खेती किसान की आसानी से पहचान की जा सकेगी। यह वेरीफिकेशन प्रणाली पूरी तरह से निशुल्क है और इसके तहत किसान को हर वर्ष वेरीफिकेशन की जरूरत नहीं है। अक्टूबर 2022 से इस वेरीफिकेशन के लिए बेवसाइट www.spnfhp.in की शुरूआत की गई है जिसके तहत अभी तक प्रदेश भर के 1,35,000 से अधिक प्राकृतिक खेती किसानों का रजिस्ट्रेशन किया जा चुका है। इनमें से 1,33,000 से अधिक किसान-बागवानों को प्रमाणपत्र प्राप्त हो चुके हैं। यह वेरीफिकेशन पीजीएस द्वारा स्थापित मानकों को भी पूरा करता है।

प्राकृतिक खेती उत्पाद की मार्केटिंग

साल के 365 दिन शहरी क्षेत्र के उपभोक्ताओं को प्राकृतिक खेती उत्पाद देने के लिए पायलट आधार पर शिमला शहर में एक आउटलेट खोला गया है। इसकी सफलता के बाद सोलन, चंडीगढ़, दिल्ली सहित प्रदेशभर में प्राकृतिक खेती उत्पाद के आउटलेट खोले जाएंगे। प्रदेशभर में प्राकृतिक खेती कर रहे किसान अपने स्तर पर अपना उत्पाद बेच रहे हैं। ऐसे में उन्हें विशेष पहचान देने एवं स्मार्ट मार्केटिंग के लिए कैनोपी दी गई हैं। यह कैनोपी प्राकृतिक खेती किसान एवं उसके उत्पाद की अलग पहचान बनाने में सहायक हो रही है। इसके अलावा प्रदेश की मंडियों में प्राकृतिक खेती उत्पाद की बिक्री हेतु भी प्रयास किए गए हैं। राज्य की 10 मंडियों में स्थान चयनित कर आधारभूत ढांचे का निर्माण किया जा रहा है।

किसान-उत्पाद कंपनियां- योजना के अधीन बड़े स्तर पर प्राकृतिक खेती कर रहे किसानों के उत्पादों के व्यापार के लिए किसान-उत्पाद कंपनियां बनाने का काम किया जा रहा है। शुरूआती तौर पर 10 कंपनियां बनाई जा रही हैं जिसमें से शिमला, सोलन, सिरमौर, बिलासपुर मण्डी एवं ऊना में 7 कंपनियों की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्होंने काम करना शुरू कर दिया है। समय के साथ इनकी संख्या बढ़ाई जाएगी। इन कंपनियों में किसान अपने उत्पाद की कीमत खुद निर्धारित करेगा। तकनीक, विपणन, खाद्य प्रसंस्करण और आदान निर्माण के लिए सहायता करने के साथ इन कंपनियों को एक राज्य स्तरीय फेडरेशन के तहत लाया जा रहा है।

राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF)

देशभर में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) की शुरूआत की है। इस मिशन के तहत देशभर में प्राकृतिक खेती को किसान समुदाय में लोकप्रिय करने के साथ इस पर अनुसंधान एवं वैज्ञानिक प्रमाणिकता को प्रमुखता दी जाएगी। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत

● प्राकृतिक खेती पर जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करना

● प्राकृतिक खेती हेतु मानक तय करना

● प्राकृतिक खेती उत्पाद की ब्रांडिंग पर काम करना

● प्राकृतिक खेती हेतु पंचायत स्तरीय कार्यनीति का निर्माण

● स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल फसलों का चुनाव व उत्पादन

प्रदेश में राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन के क्रियान्वयन के लिए कृषि विभाग ने सभी ज़िम्मेदारों के साथ बैठक कर इसकी कार्ययोजना बनाने के लिए काम शुरू कर दिया है।

प्राकृतिक खेती पर प्रारंभिक अध्ययनों के नतीजे

● प्रदेश के सभी 4 जलवायु क्षेत्रों के 325 प्राकृतिक खेती किसानों के उपर किए अध्ययन में खेती के साथ फल उत्पादन कर रहे किसानों का प्रतिशत सबसे अधिक 40.6 प्रतिशत रहा और उन्होंने माना कि इस खेती विधि से उनका शुद्ध लाभ भी 21.44 प्रतिशत की दर से बढ़ा है। इसके साथ ही उनकी लागत में 14.34 से 45.55 प्रतिशत की कमी और कुल आय में 11.8 से 21.55 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। यह दर्शाता है कि प्राकृतिक खेती पारम्परिक खेती की तुलना में ज्यादा कारगर है।

● गेहूं की खेती करने वाले 254 किसानों के उपर किए गए अध्ययन में इन किसानों की लागत में 28.11 फीसदी की कमी आई है। इसके अलावा प्राकृतिक खेती विधि को पारम्परिक खेती के मुकाबले पीला रतुआ बीमारी से निपटने में 75.05 फीसदी बेहतर पाया गया है।

● सेब बागवानों के उपर किए गए अध्ययन में पारम्परिक खेती के मुकाबले प्राकृतिक खेती में कई मायनों में लागत में कमी आई है। फलोत्पादन और कीमत की श्रेणी में दोनों खेती विधियां बराबर आंकी गई हैं, लेकिन कम लागत होने की वजह से प्राकृतिक खेती विधि में किसानों के शुद्ध लाभ में 27.41 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अध्ययन में शामिल अधिकतर बागवानों ने इस बात की पुष्टि की है कि प्राकृतिक खेती में उनकी लागत 56.5 प्रतिशत तक घटी है, स्वाद बेहतर हुआ है और सूखे की स्थिति में फसलें बेहतर रही हैं।

हिमाचल सरकार ने प्रदेश के सभी 9 लाख 61 हजार किसानों को सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती विधि से जोड़कर हिमाचल प्रदेश को ‘प्राकृतिक खेती राज्य’ के रूप में पहचान दिलवाने का लक्ष्य रखा है।

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