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नारियल के छिलके से लाखों का बिजनेस, सुनिए दापोली के श्रवण डाँडेकर की कहानी

रिपोर्ट – अरविंद शुक्ला (दापोली, महाराष्ट्र) कोई कचरे के रीयूज के बारे में जब बात करता है तो हमें वह अक्सर छोटे पैमाने पर ही नजर आता है. लेकिन विज्ञान की तरक्की के इस युग में अब कचरे के सहारे बड़ी बड़ी

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Rohit· Correspondent

27 जून 2024· 3 min read

नारियल के छिलके से लाखों का बिजनेस, सुनिए दापोली के श्रवण डाँडेकर की कहानी

नारियल के छिलके से लाखों का बिजनेस, सुनिए दापोली के श्रवण डाँडेकर की कहानी

रिपोर्ट – अरविंद शुक्ला (दापोली, महाराष्ट्र)

कोई कचरे के रीयूज के बारे में जब बात करता है तो हमें वह अक्सर छोटे पैमाने पर ही नजर आता है. लेकिन विज्ञान की तरक्की के इस युग में अब कचरे के सहारे बड़ी बड़ी फ़ैक्टरीज चलने लग गई हैं. खास बात है कि तकनीकी वरदान के सहारे आम लोग भी इसी तरह बिजनेस की दुनिया में उतरने की हिम्मत कर पा रहे हैं.

आज हम आपको बताने जा रहे हैं श्रवण डाँडेकर के बारे में जो मूल रूप से दापोली महाराष्ट्र के रहने वाले हैं. श्रवण ने दापोली में ही अजरालय ऐग्रो इंडस्ट्री शुरू की है जहां वह इस्तेमाल के बाद फेंके हुए नारियल की मदद से कोकोपिट और अक्सर काम आने वाली मजबूत रस्सी तैयार करते हैं. उनका ये बिजनेस अब बड़े पैमाने पर हो चुका है.

न्यूज पोटली जब श्रवण डाँडेकर के काम को करीब से देखने पहुंची तब उन्होंने अपने काम के बारे में हमें विस्तार से बताया.

‘’हम नारियल के छिलके से यहाँ दो मेन प्रोडक्ट बनाते हैं. पहला कोकोपिट और दूसरी नारियल के छिलके से ही बनी रस्सी. हमारे पास इस काम के लिए तीन मशीनें हैं , जिनकी कुल कीमत लगभग 12 लाख रुपए हैं.

भारत सरकार के कृषि और खाद्य मंत्रालय के रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर साल लगभग 2100 हजार हेक्टेयर जमीन पर कोकोनट की खेती होती है जिससे लगभग 14000 हजार मीट्रिक टन कोकोनट का उत्पादन होता है. अब अगर खेती ही इतने बडे पैमाने पर हो रही है तो जाहिर है इससे निकलने वाला कच्चा माल भी बहुत बड़ी मात्रा मे होगा. श्रवण ने इन्हीं आंकड़ों में अपने काम की चीज देखी और एक उद्योग की तरफ रुख किया और वो आज अपने इस उद्योग में सफल भी हैं.
श्रवण आगे बताते हैं कि किस तरह से उन्हें इस काम के लिए सरकारी सहायता भी मिली है. हालांकि उनका यह भी कहना है कि ऐसी इंडस्ट्री तब ही लगाई जा सकती है जब पच्चीस किलोमीटर के रेडियस में कच्चे माल (नारियल के छिलके) की भरपूर उपलब्धता हो. उनका कहना है कि कोई भी बिजनेस बगैर कच्चे माल की उपलब्धता के शुरू नहीं किया जा सकता.

हालांकि वह अपनी राह में आए संघर्षों का जिक्र करना नहीं भूलते. उनका कहना है कि लोन पर ली हुई मशीनों की ईएमआई, फैक्ट्री की जगह का किराया और वहाँ काम करने वालों की सैलरी अब तक बहुत आराम से निकल रही है. उनको उम्मीद है कि उनका ये नया उपक्रम जल्द ही और ऊंचा उठेगा.

श्रवण के इस उपक्रम के बारे में और ज्यादा विस्तार से जानने के लिए आप न्यूज पोटली की ये रिपोर्ट यहाँ से देख सकते हैं:

यहाँ क्लिक करें

इस वीडियो में वो बता रहे हैं कि किस तरह उन्हें इस कारोबार का आइडिया आया, इसे शुरू करने के लिए उन्होंने कहाँ कहाँ से मदद ली और इसमें कुल कितनी लागत लगी. उन्हीं से सुनिए कि उनका यहाँ तक पहुँचने का सफर कैसा रहा और अब कैसा चल रहा है?
साथ ही अगर आपका ऐसा कुछ भी शुरू करने का इरादा है तो आप श्रवण के अनुभवों से सीख सकते हैं.

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