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टमाटर के बाद लोगों पर पड़ेगी प्याज की महंगाई की मार

अंतरराष्ट्रीय संस्था क्रिसिल की रिपोर्ट ने प्याज की बढ़ने वाली कीमत के 4 कारणों को सामने रखा और बताया कि प्याज की बढ़ती अनुमानित कीमत 70 रुपए प्रति किलो तक हो सकती है।

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Ashish·Correspondent·08 Aug 2023· 6 min read

टमाटर के बाद लोगों पर पड़ेगी प्याज की महंगाई की मार

टमाटर के बाद लोगों पर पड़ेगी प्याज की महंगाई की मार

अंतरराष्ट्रीय संस्था क्रिसिल की रिपोर्ट ने प्याज की बढ़ने वाली कीमत के 4 कारणों को सामने रखा और बताया कि प्याज की बढ़ती अनुमानित कीमत 70 रुपए प्रति किलो तक हो सकती है।

लखनऊः महंगे दामों पर टमाटर खरीदने की टेंशन अभी खत्म भी नहीं हुई है, और प्याज़ आम आदमी के आंसू निकालने को तैयार हैं। टमाटर के बाद प्याज की कीमतें भी आपका बजट बढ़ाने को बेताब नजर आ रही हैं। मार्केट और कृषि जानकारों का मानना है कि अगस्त के आखिर तक मार्केट में प्याज़ की डिमांड ज्यादा और सप्लाई में कमी हो सकती है, जिसके चलते प्याज के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो टमाटर के बाद प्याज भी आम आदमी की थाली से दूर हो सकते हैं।

बाजार पर नजर रखने वाली अंतराष्ट्रीय एजेंसी क्रिसिल मार्केट इंटेलिजेंस एंड एनालिटिक्स ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि सितंबर से रिटेल मार्केट में प्याज महंगा हो जाएगा। अभी जो प्याज 20-30 रुपए किलो खुले बाजार में बिक रहा है वो 70 रुपए किलो तक पहुंच सकते हैं। एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में इसके लिए 4 बड़ी वजह बताई गई है।

1. बेमौसम बारिश

क्रिसिल के मुताबिक प्याज़ उत्पादन क्षेत्रों में इस साल मार्च में बारिश की वजह से फसल की क्वालिटी खराब हुई है।

2. जीवन अवधि

बेमौसम बारिश और भीगने के चलते रबी सीजन का प्याज में नमी आ गई थी, नमी की वजह से प्याज़ की जीवन अवधि 6 महीने से घटकर 4-5 महीने की रह गई। यानि प्याज जल्दी सड़ रहा।

3. सप्लाई और डिमांड

क्यों हो सकता है प्याज महंगा, जानिए न्यूज पोटली की रिपोर्ट में।

फल-सब्जियों और अनाज के रेट कम ज्यादा होने में डिमांड-सप्लाई का बड़ा खेल होता है। अब जब भंडारण कम होगा और डिमांड वैसे ही होगी तो दाम बढ़ना लगभग तय है। क्योंकि यहां पूरा खेल डिमांड और सप्लाई का हो जाता है। और ये आप जानते हैं कि कम सप्लाई और हाई डिमांड पर चीज़ों के दाम बढ़ जाते हैं।

4. फरवरी की गर्मी

क्रिसिल की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2023 में फ़रवरी महीने में औसत से ज़्यादा तापमान होने की वजह से प्याज़ के प्रमुख उत्पादक प्रदेशों में प्याज़ जल्दी पक गई। फरवरी में इस साल गर्मी के मामले में 122 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया था।

रिपोर्ट के दावों की माने तो महाराष्ट्र में कुल उत्पादन का 49%, मध्य प्रदेश में कुल उत्पादन का 22%, राजस्थान में कुल उत्पादन की 6% प्याज़ जल्दी पक गई। इसकी वजह से इसकी कटाई जल्दी करनी पड़ी।

मौसम की मार किसान उपभोक्ता दोनों परेशान

प्याज का हाल भी कुछ-कुछ टमाटर जैसा है। फरवरी-अप्रैल के महीने में न्यूज पोटली ने महाराष्ट्र के नाशिक समेत कई जिलों से ग्राउण्ड रिपोर्ट की थी। जिसमें न्यूज पोटली ने बताया था कि कैसे किसान मजबूरी में 2-5 रुपए किलो तक प्याज बेचने को मजबूर थे, कई किसानों ने खेत में प्याज जोत डाला था। सोशल मीडिया पर वायरल हुआ मंडी का वो बिल जिसमें 512 किलो प्याज बेचने वाले किसान राजेंद्र तुकाराम को 2 रुपए मिले थे, और एक किसान को 825 किलो प्याज बेचने पर 1 रुपए घर से देना पड़ा था। और नाशिक के किसान सुनील बोरगुड़े ने 2 एकड़ फसल पर रोटावेटर चला दिया।

महाराष्ट्र से ग्राउण्ड रिपोर्ट

टमाटर, अदरक, लहसुन या कोई दूसरी फसल, के रेट कम या ज्यादा होने में अनियमित बारिश, सूखा, बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि आदि का बहुत असर होता है। इस साल भी पहले प्याज के रेट बेहद कम होने और फिर आने वाले दिनों में बढ़ने की वजह बारिश ही है। रबी सीजन के प्याज जो हम-आप इस वक्त खा रहे हैं, बारिश के चलते किसानों को बहुत नुकसान हुआ। मार्च-अप्रैल में बेमौसम बारिश के किसानों का बहुत ज्यादा प्याज खेत में सड़ गया, जो बचा वो नमी के चलते किसानों के भंडारगृहों में सड़ गया। न्यूज पोटली ने भी इस बात की आशंका जताई थी कि जिस रफ्तार से प्याज सड़ रहा है, हालात बिगड़ सकते हैं। यहां एक बात और गौर करने वाली है अगर प्याज के दाम बढ़े तो उसका ज्यादा फायदा किसानों को नहीं मिलेगा क्योंकि किसान ज्यादातर प्याज बेच चुके हैँ। अब कम किसानों के पास प्याज है जो सड़ रहा है।

दरअसल रबी सीजन का प्याज़ आमतौर पर मार्च में मार्केट में आता है, लेकिन इस बार जल्दी कटाई की वजह से ये प्याज़ फरवरी में ही मार्केट में बिकने के लिए आ गया। आमतौर पर फरवरी में खरीफ सीजन की देर से बोई गई फसल की आपूर्ति होती है। लेकिन इस बार रबी और खऱीफ की फसल एक साथ मार्केट में आने पर उस वक्त प्याज़ के दाम में काफी गिरावट देखी गई। इससे किसानों को भी बहुत नुक़सान हुआ।

रबी का स्टॉक आमतौर पर सितंबर के अंत तक मांग को पूरा करने के लिए रखा जाता है। इसके बाद ही मांग को खरीफ की फसल से पूरा किया जाता है। कुल प्याज़ उत्पादन में रबी की फसल की हिस्सेदारी 70% तक होती है। लेकिन बेमौसम बारिश ने इस बार किसानों का पूरा गणित ही बिगाड़ दिया है।

हालांकि क्रिसिल की रिपोर्ट में ये उम्मीद जताई गई है कि अक्टूबर में खरीफ की फसल की आवक शुरू होने पर प्याज़ के दाम भी गिरने शुरू हो जाएंगे। रिपोर्ट में प्याज़ उत्पादन में गिरावट की उम्मीद नहीं जताई गई है।

प्याज़ का इस साल उत्पादन 2.90 करोड़ टन होने का अनुमान है। जो पिछले 5 सालों के औसत से 7 फीसदी ज़्यादा है

चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्याज उत्पादक देश है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब 1.9 मिलियन हेक्टेयर में प्याज की खेती होती है और मोटे तौर पर 31 मिलियन मीट्रिक टन का उत्पादन होता है।

उगाने के साथ खाने के मामले में भी भारत बहुत आगे हैं, क्रिसिल की पिछले साल की रिपोर्ट के मुताबिक भारत औसतन 13 लाख टन प्याज हर महीने खाया जाता है। घरेलू सब्जियों की कैटेगरी में प्याज का जलवा टमाटर से कहीं आगे है।

आपकी जानकरी के लिए यहां ये भी बता दें कि देश में प्याज़ का उत्पादन 3 सीज़न में होता है। रबी, खरीफ और खरीफ में देरी से की गई बुआई जिसे लेट खरीफ बोलते हैं। 219 लाख टन की रबी की फसल पहले ही आ चुकी है। बाकी 100 लाख टन खरीफ में देर से बोई गई वैरायटी से आएगी। जो सर्दियों के मौसम में डिमांड को पूरा करेगी।

प्याज के कारोबारियों का मानना है कि डिमांड और सप्लाई को देखते हुए कीमतों पर नियंत्रण के लिए NCCF और नेफेड जैसी सरकारी खरीद एजेंसियां किसान उत्पादन संगठनों और क्लस्टर आधारित व्यापार संगठनों के साथ मिलकर 3-4 लाख टन प्याज का स्टॉक बाजार में जारी कर सकती हैं। हालांकि खरीफ लेट फसल बाज़ार में आने से प्याज़ के दाम ऊंचाई पर बने रहे सकते हैं।

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