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लो टनल तकनीक से अब ऑफ-सीजन सब्जियों की होगी भरपूर पैदावार

लो टनल तकनीक ठंड के मौसम में सब्जियों की जल्दी और ज्यादा पैदावार के लिए बेहद उपयोगी है। इसमें पौधों को पारदर्शी प्लास्टिक शीट से ढक दिया जाता है, जिससे ठंड और पाले से बचाव होता है। इस तकनीक से फसल 30–

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Pooja Rai· Correspondent

8 नवंबर 2025· 2 min read

लो टनल तकनीक से अब ऑफ-सीजन सब्जियों की होगी भरपूर पैदावार

लो टनल तकनीक से अब ऑफ-सीजन सब्जियों की होगी भरपूर पैदावार

लो टनल तकनीक ठंड के मौसम में सब्जियों की जल्दी और ज्यादा पैदावार के लिए बेहद उपयोगी है। इसमें पौधों को पारदर्शी प्लास्टिक शीट से ढक दिया जाता है, जिससे ठंड और पाले से बचाव होता है। इस तकनीक से फसल 30–40 दिन पहले तैयार हो जाती है और ऑफ-सीजन में ऊँचे दाम पर बिकती है। कम लागत, आसान निर्माण और ज्यादा मुनाफे की वजह से किसान इसे तेजी से अपना रहे हैं।

केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान (ICAR), बीकानेर के मुताबिक “लो टनल तकनीक” ऑफ-सीजन सब्ज़ियों के उत्पादन का एक सरल और कारगर तरीका है। इस तकनीक में पारदर्शी प्लास्टिक शीट को सब्जियों की कतारों पर ढक दिया जाता है, जिससे ठंड के मौसम में पौधों के आसपास की हवा गर्म बनी रहती है।

क्या है लो टनल तकनीक?
लो टनल पारदर्शी प्लास्टिक से बनी एक सुरंग जैसी संरचना होती है जो पौधों को ठंड, पाले, वर्षा और तेज हवा से बचाती है। इससे पौधों की वृद्धि में तेजी आती है और फसल सामान्य समय से 30–40 दिन पहले तैयार हो जाती है।

फायदे

पौधों को ठंड और पाले से सुरक्षा

कम लागत में आसान निर्माण

ऑफ-सीजन में ऊँचे दामों पर फसल की बिक्री

उत्पादन जल्दी और ज्यादा

ये भी पढ़ें - यूपी: गन्ना विकास विभाग तैयार करेगा 46 लाख बड पौध, 3.20 लाख हेक्टेयर में होगी गन्ने की बुवाई

बनाने का तरीका

जस्ती लोहे की रॉड (1.5–2.5 मी.) पर 100 माइक्रॉन IR ग्रेड प्लास्टिक चढ़ाई जाती है।

ऊँचाई: 40–60 सेमी, पौधों की दूरी: 50 सेमी।

कतार दूरी: 1.5–1.6 मीटर रखी जाती है।

ड्रिप सिंचाई प्रणाली के साथ यह तकनीक सबसे बेहतर मानी गई है।

उपयुक्त फसलें
खीरा, तुरई, करेला, लोकी, टमाटर, मिर्च, बैंगन, पत्ता गोभी, फूल गोभी और ब्रोकोली जैसी फसलें लो टनल तकनीक के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। आईसीएआर के अनुसार इस तकनीक से किसान 1.5 महीने पहले फसल तैयार कर सकते हैं, जिससे ठंड के मौसम में ऊँचे भाव पर बिक्री संभव होती है। कम लागत और अधिक लाभ के कारण यह तकनीक किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

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