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महाराष्ट्र में दूध उत्पादक किसान क्यों हुए आंदोलन को मजबूर?

आपको अपने शहर या कस्बे में कितने रुपए में दूध मिल रहा है? 50 रुपए या साठ रुपए प्रति लीटर? कई बार शायद साठ से भी ज्यादा खरीदते हों. लेकिन दुख की बात ये है कि खरीददार महंगा खरीद जरूर रहे हैं लेकिन बेचने

Pooja Rai

Pooja Rai·27 Jun 2024· 4 min read

महाराष्ट्र में दूध उत्पादक किसान क्यों हुए आंदोलन को मजबूर?

महाराष्ट्र में दूध उत्पादक किसान क्यों हुए आंदोलन को मजबूर?

रिपोर्ट - सिद्धनाथ माने (लातूर, महाराष्ट्र)

आपको अपने शहर या कस्बे में कितने रुपए में दूध मिल रहा है? 50 रुपए या साठ रुपए प्रति लीटर? कई बार शायद साठ से भी ज्यादा खरीदते हों. लेकिन दुख की बात ये है कि खरीददार महंगा खरीद जरूर रहे हैं लेकिन बेचने वाले महंगा नहीं बेच पा रहे. डेयरी किसान कम दामों में दूध बेचने को लेकर परेशान हैं. महाराष्ट्र में इसको लेकर अब प्रदर्शन की नौबत आ गई है.
यहाँ राज्य भर के दुग्ध उत्पादक किसान मांग कर रहे हैं कि सरकार की तरफ से दूध के दाम 40 रुपए किए जाएं. उनका कहना है उन्हें अब इस दाम पर बिक्री करना घाटे का सौदा पड़ रहा है. परिणामस्वरूप महाराष्ट्र के कई जिलों में दुग्ध उत्पादकों का ये असंतोष कहीं सड़क जाम के तौर पर तो कहीं अनशन- आंदोलन के तौर पर दिख रहा है.

ये भी पढ़ें -महाराष्ट्र: मुख्यमंत्री शिंदे का निर्देश, प्रभावित किसानों को 30 जून तक दिया जाये मुआवज़ा

क्या है पूरा मामला?

दरअसल दूध के दाम के दाम को लेकर किसानों की ये नाराजगी नई नहीं है. उनका कहना है कि वो पिछले एक साल से एक लीटर दूध में भी 10 से 15 रुपए का घाटा सह रहे हैं. और अब यह घाटा बर्दाश्त से बाहर है. इन दूध उत्पादक किसानों की ये मांग है कि राज्य सरकार को नागपुर अधिवेशन में दूध का रेट कम से कम 40 रुपये का कर देना चाहिए. दूसरे सरकार को बंद की गई दूध पर सब्सिडी फिर से शुरू कर देना चाहिए ताकि किसानों को भी घाटा ना हो और आम लोगों पर भी बढ़े हुए दामों का बोझ ना पड़े. किसानों का ये भी कहना है कि सब्सिडी बंद होने के दौरान किसानों को जितना घाटा हुआ है सरकार उसकी भरपाई भी करे. ये सारी मांगें महाराष्ट्र की दुग्ध उत्पादक किसान संघर्ष समिति ने सामने रखी हैं. इतना ही नहीं ये संगठन 28 जून से सरकार का अपनी मांगों पर ध्यान आकर्षित कराने के लिए 28 जून से प्रदेश में एक संगठित आंदोलन शुरू कर रहा है. इसके तहत किसान सभा और समान विचारधारा वाले सभी किसान संगठन कार्यकर्ताओं के साथ आकर आंदोलन को और तेज करने जा रहे हैं.

क्या है किसानों की मांगें?

इस समस्या के स्थायी हल के लिए सरकार को वर्तमान में समाधान के साथ साथ लॉंग टर्म के लिए पॉलिसी बनाने की जरूरत है.

गन्ने की ही तरह दूध के लिए भी एफआरपी उत्पादन लागत के आधार पर तय किया जाए.

सरकार को राजस्व साझाकरण नीति लाने की जरूरत है, इसके साथ साथ दूध मूल्य आयोग की स्थापना, पशु चारा और पशु दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण और निजी- सहकारी समितियों पर कठोर नियंत्रण के लिए एक कानून बने.

आंदोलन- प्रदर्शन में शामिल किसानों का यह भी कहना है कि सरकार दूध में हो रही मिलावट को तो रोके ही लेकिन उसके साथ साथ गड़बड़ ब्रांडस को बाजार में आने से रोकने के लिए एक राज्य, एक ब्रांड की नीति अपनाए.

इन सबके अलावा तालुका'वार स्वतंत्र निरीक्षकों की नियुक्ति की जाए जो यह जाँचते रहें कि इस व्यवसाय में सभी नियमों का पालन हो रहा है या नहीं और इसके साठ ही इस व्यवसाय पर निर्भर किसानों को सरकारी अनुदान के साथ पशु स्वास्थ्य बीमा योजना का भी लाभ दिया जाए.

न्यूजपोटली से बातचीत में किसानों ने ये सारी मांगे बताई हैं और साथ ही राज्य सरकार से ये आग्रह भी किया है कि इन पर तुरंत संज्ञान नहीं लिया गया तो कल (28 जून) से शुरू हो रहा आंदोलन का दायरा पूरे राज्य में फैलता ही चला जाएगा और आंदोलन और तेज किया जाएगा. इस पूरे मामले पर अभी सरकार की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.

देखिये किसान की अनोखी बगिया -

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