"20 साल से कॉर्पोरेट सेक्टर में जॉब किया। 30 लाख रुपए सालाना का पैकेज था। सब कुछ सही भी चल रहा था लेकिन सुकून नहीं था। फिर एक दिन नौकरी छोड़ दी और अपने गांव लौट। अब यहां मैं अपनी नौकरी से ज्यादा पैसे भी कमा रहा, सुकून भी है।"
रायबरेली जिले के रहने वाले कुंवर मोहित सिंह जब यह बता रहे थे तो खुशी उनके चेहरे पर साफ देखी जा सकती थी। हो भी क्यों ना, अब वे आसपास के गांवों के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत जो बन गये हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि खेती करके भी अच्छी कमाई की जा सकती है।
मोहित के मुताबिक खेती के जुनून ने उन्हें नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। अब वे अपने पैतृक गांव में खेती कर रहे हैं। उनके पास 30 एकड़ का एक फार्म है जिसमें उन्होंने तरबूज और केला लगाया है। "मेरा परिवार हमेशा से खेती किसानी वाला ही रहा है। लेकिन हम पढ़ लिख के शहर में नौकरी करने चले गये थे। अब जब बहुत जगह घुमा फिरा और देखा कि खेती में बहुत संभावनाएं तो नौकरी छोड़कर वापस गांव आ गया और यहां खेती शुरू कर दी। शुरुआत में दिक़्क़त हुई। लेकिन धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा। सबसे बड़ी बात ये है कि खेती में सुकून है जो कॉर्पोरेट जॉब या कोई दूसरे जॉब में नहीं है।"
मोहित सिंह 30 एकड़ में केला और तरबूज की खेती करते हैं। उनका जोर सस्टेनेबल तरीके से खेती करने पर है। इससे क्या होता है कि खेत की मिट्टी की उत्पादकता बनी रहती है और पर्यावरण का भी नुकसान नहीं होता है। इसलिए वो कम से कम कीटनाशक और केमिकल वाले खाद का प्रयोग करते हैं। कीट प्रबंधन के लिये वो IPM और स्टिकी ट्रैप को ज्यादा महत्व देते हैं।
"मेरी कोशिश यही रहती है कि हमारा उत्पाद केमिकल फ्री रहे। इससे हमे दो फायदा मिलता है, एक तो जितना खर्च हम फर्टिलाइजर, इंसेक्टिसाइड और पेस्टीसाइड्स पर करते हैं उसके 50% कम खर्चे में compost, IPM और स्टिकी ट्रैप का प्रयोग कर उपभोक्ता के लिए सही उत्पाद तैयार करते हैं जिसका कोई साइड इफ़ेक्ट ना हो।" वे आगे बताते हैं।
कॉर्पोरेट जॉब और खेती के बीच के अंतर को लेकर वे कहते हैं कि खेती में टाइम बहुत इंपोर्टेंट है। जबकि कॉर्पोरेट जॉब टारगेट मीट करना होता है। लेकिन खेती हम अपने हिसाब से कर सकते हैं। इस पर किसी का कोई दबाव नहीं है, इसलिए इसमें सुकून है।
हालांकि वे खेती के प्रति सरकार की उदासीनता को लेकर भी नाराज हैं। वे कहते हैं, "खेती को लेके सरकार में उदासीनता है। लेकिन अभी कुछ सालों से काफी योजनाएं आ रही हैं जिसकी मदद हम ले सकते हैं। आज कल सोशल मीडिया पर सब कुछ है। अगर कोई जानना सीखना चाहे तो सीख सकता है।
30 लाख सालाना की नौकरी छोड़ी, शुरू की इन फसलों की खेती, अब हो रही बम्पर कमाई
"20 साल से कॉर्पोरेट सेक्टर में जॉब किया। 30 लाख रुपए सालाना का पैकेज था। सब कुछ सही भी चल रहा था लेकिन सुकून नहीं था। फिर एक दिन नौकरी छोड़ दी और अपने गांव लौट। अब यहां मैं अपनी नौकरी से ज्यादा प
Pooja Rai· Correspondent
7 जून 2024· 3 min read
और पढ़ें.

ILDC कॉन्फ्रेंस 2025: कृषि की चुनौतियों में किरायेदार किसान, कैसे मिले सुरक्षा और अधिकार!
भारत एक कृषि प्रधान देश हैं। जहां एक व्यापक किसान वर्ग कृषि पर आश्रित है। इस किसान वर्ग में एक बड़ी आबादी किरायेदार किसानों की भी है। इन किरायेदार किसानों को असलियत में किसान नहीं माना जाता है। इस स्थ

भारत-अमेरिका डील के बाद GM फसलों पर क्यों बढ़ी बहस?
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के बाद GM (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलों को लेकर बहस तेज हो गई है। भारत ने कुछ अमेरिकी कृषि उत्पादों पर कम या शून्य शुल्क देने की सहमति दी है, लेकिन सरकार का कहना है कि संवेदनश

राष्ट्रीय दलहन क्रांति: बिहार को दलहन खेती बढ़ाने के लिए 93.75 करोड़ की मदद
सीहोर में आयोजित राष्ट्रीय दलहन कार्यक्रम में केंद्र ने देश में दलहन उत्पादन बढ़ाने की पहल शुरू की और बिहार को 93.75 करोड़ रुपये की सहायता दी। बिहार सरकार ने पांच साल में दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर ब
