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बिर्होर जनजाति: भूले हुए वादों और अधूरी योजनाओं की गवाही

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया ज़िले में रहने वाली बिर्होर जनजाति आज भी ग़रीबी, कुपोषण और सरकारी उपेक्षा से जूझ रही है। योजनाओं और बजट के बावजूद न तो इन्हें सही घर मिले, न शिक्षा, न स्वास्थ्य सेवाएँ। महुलता

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Pooja Rai· Correspondent

16 सितंबर 2025· 5 min read

बिर्होर जनजाति: भूले हुए वादों और अधूरी योजनाओं की गवाही

बिर्होर जनजाति: भूले हुए वादों और अधूरी योजनाओं की गवाही

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया ज़िले में रहने वाली बिर्होर जनजाति आज भी ग़रीबी, कुपोषण और सरकारी उपेक्षा से जूझ रही है। योजनाओं और बजट के बावजूद न तो इन्हें सही घर मिले, न शिक्षा, न स्वास्थ्य सेवाएँ। महुलतानर गाँव की सरला शिकारी जैसी महिलाएँ टूटे घर और बीमार शरीर के साथ सिर्फ़ रस्सी बनाकर गुज़ारा करती हैं। बिर्होरों की कहानी ग़रीबी से बढ़कर व्यवस्थित उपेक्षा और भूले हुए वादों की सच्चाई को उजागर करती है।

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया ज़िले के महुलतानर गाँव की सबसे बुज़ुर्ग महिला सरला शिकारी अपने छोटे से घर के बाहर खड़ी थीं। उनका चेहरा पीड़ा से भरा हुआ था। गंभीर कुपोषण से पीड़ित सरला न तो सही से बंगाली समझ पाती हैं और न बोल पाती हैं। वह मुख्यतः बिर्होर भाषा में ही संवाद करती हैं। बिर्होर जनजाति अत्यंत संवेदनशील जनजातीय समूह (PVTG) में शामिल है।

“बिर” का अर्थ जंगल और “होर” का अर्थ मनुष्य होता है, यानी बिर्होर का मतलब ‘जंगल के लोग’ या ‘वनवासी’। इनकी भाषा मुंडा शाखा की है, लेकिन इसकी कोई लिपि नहीं है।

बारिश और टूटा घर
दो साल पहले सरकार की ओर से सरला को PVTG प्रोजेक्ट के तहत 1.6 लाख रुपये की लागत से एक घर मिला था। लेकिन घर इतना खराब बना कि हल्की बारिश में ही पानी अंदर भर जाता है। पत्रकार को उन्होंने हाथ पकड़कर अंदर ले जाकर दिखाया कि कैसे उनके कंथा (हाथ से बने बिस्तर) बारिश में भीग जाते हैं।

सरला विधवा हैं और उनका बेटा रेना शिकारी (40) कुपोषण से दो साल पहले मर गया। अब वह अकेली, बीमार और कमजोर होकर पुराने सीमेंट के बोरे काटकर रस्सी बनाने का काम करती हैं। “कमर, पैर और गर्दन में तेज़ दर्द है। 20–25 रुपये कमाती हूँ, बस इससे ही गुज़ारा होता है,” वह कहती हैं।

इलाज के लिए जंगल पर भरोसा
गाँव से नज़दीकी अस्पताल झालदा 22 किलोमीटर दूर है और वहाँ तक कोई बस सेवा नहीं है। न दवा खरीदने के पैसे हैं और न ही नियमित स्वास्थ्य सेवाएँ। यही कारण है कि बिर्होर लोग आज भी पत्तियों, जड़ों और बेलों से इलाज करते हैं। बुखार, खाँसी, हड्डी टूटने, यहाँ तक कि महिलाओं की बीमारियों तक का इलाज इन्हीं से किया जाता है।

लेकिन इस पारंपरिक पद्धति की वजह से कई लोग लंबी बीमारियों में फँस जाते हैं और समय से पहले मौत का शिकार हो जाते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि स्वास्थ्य कर्मी कभी-कभार महामारी के समय आते हैं, बाकी साल कोई पूछने नहीं आता।

घटती आबादी और संघर्ष
चिंताजनक बात यह है कि बिर्होर समुदाय की प्रजनन क्षमता घट रही है, जिससे इनकी आबादी लगातार कम हो रही है।
2011 की जनगणना के अनुसार, देश में बिर्होरों की आबादी मात्र 17,241 थी, यानी कुल जनजातीय आबादी का सिर्फ 0.01%। पश्चिम बंगाल में इनकी संख्या 2,241 दर्ज की गई, जो मुख्यतः पुरुलिया ज़िले के चार गाँवों में रहते हैं।

आजीविका और रोज़मर्रा की कठिनाइयाँ
बिर्होरों की आय का मुख्य स्रोत है —

1.जंगल से लकड़ी और टहनियाँ लाकर बेचना
2.रस्सी (जोर) बनाना
3.कुछ महिलाएँ खेतिहर मज़दूरी करती हैं
4.कई युवा रोज़गार की तलाश में बाहर राज्यों में पलायन करते हैं

महुलतानर गाँव की स्थिति सबसे खराब है। यहाँ 14 परिवार रहते हैं। महिलाओं को लक्ष्मी भंडार योजना का लाभ नहीं मिल रहा। कई लोग राशन से भी वंचित हैं क्योंकि उनके पास आधार कार्ड नहीं है।ग्राम पंचायत ने शौचालय तो बनाया, लेकिन पानी की व्यवस्था नहीं है। स्कूल न के बराबर हैं, सिर्फ एक बच्ची रीना शिकारी (कक्षा 5) पढ़ने जाती है।

टूटी उम्मीदें और अधूरी योजनाएँ
महुलतानर गाँव में दो घर PVTG योजना के तहत बने, लेकिन दोनों से छत टपकती है। रस्सी बनाने के लिए महिलाएँ सीमेंट की खाली बोरियाँ 1 रुपये में खरीदती हैं और एक रस्सी बनाकर 25 रुपये में बेचती हैं। पूरा दिन मेहनत के बाद इतनी ही कमाई होती है।

कई पुरुष मज़दूरी के लिए तमिलनाडु और अन्य राज्यों गए, लेकिन बीमारी या काम न मिलने के कारण वापस लौट आए। गाँव में न रोजगार है, न पशुपालन की सुविधा। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर उन्हें गाय-बकरी दी जाए, तो वे आत्मनिर्भर हो सकते हैं।

सरकार की योजनाएँ और हकीकत
पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में बिर्होरों को आधिकारिक रूप से PVTG घोषित किया गया था। 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (PM-JANMAN) शुरू किया। इसका लक्ष्य है तीन वर्षों में स्वच्छ जल, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोज़गार उपलब्ध कराना। इसके लिए ₹24,104 करोड़ का बजट भी तय हुआ है।लेकिन हकीकत यह है कि महुलतानर के बिर्होर अब भी जर्जर घरों, अधूरी योजनाओं और भूख-प्यास के साथ जी रहे हैं।

सवाल और निष्कर्ष
बिर्होरों की कहानी केवल ग़रीबी की नहीं, बल्कि व्यवस्थित उपेक्षा और भूले हुए वादों की कहानी है। योजनाएँ कागज़ों तक सीमित हैं, लेकिन गाँव की हालत जस की तस है।सवाल यह है कि कब तक भारत अपने जनजातीय धरोहर पर गर्व के भाषण देगा और असली वनवासी समुदाय अदृश्य और उपेक्षित रहेंगे?
बिर्होरों को दान नहीं, बल्कि न्याय चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान और रोज़गार का अधिकार।जब तक यह नहीं मिलता, तब तक सरला शिकारी का भीगा हुआ बिस्तर और बच्चों के भूखे पेट हमारी सामूहिक उदासीनता का प्रतीक बने रहेंगे।

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