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धान पर सब्सिडी जारी रही तो 2030 तक भारत को 80-100 लाख टन दालों का आयात करना पड़ेगा: कृषि अर्थशास्त्री

'अगर धान पर भारी सब्सिडी देने की मौजूदा सरकारी नीति जारी रही तो घरेलू मांग को पूरा करने के लिए भारत को 2030 तक 80-100 लाख टन दालों का आयात करना पड़ेगा।' कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी आगे यह भी कहते है

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Indal·Correspondent·12 Aug 2024· 3 min read

धान पर सब्सिडी जारी रही तो 2030 तक भारत को 80-100 लाख टन दालों का आयात करना पड़ेगा: कृषि अर्थशास्त्री

धान पर सब्सिडी जारी रही तो 2030 तक भारत को 80-100 लाख टन दालों का आयात करना पड़ेगा: कृषि अर्थशास्त्री

'अगर धान पर भारी सब्सिडी देने की मौजूदा सरकारी नीति जारी रही तो घरेलू मांग को पूरा करने के लिए भारत को 2030 तक 80-100 लाख टन दालों का आयात करना पड़ेगा।' कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी आगे यह भी कहते हैं कि किसानों को दाल की खेती के ल‍िए प्रोत्साहित करने की भी जरूरत है क्योंकि धान की तुलना में दालों की खेती में पानी की कम लगता है और ये अधिक पौष्टिक भी होती हैं।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के पूर्व अध्यक्ष गुलाटी ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए किसानों को दालों और तिलहनों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के लिए फसल प्रोत्साहन संरचना पर जोर दिया। दालों में आत्मनिर्भर बनने के सरकार के लक्ष्य के बारे में पूछे जाने पर गुलाटी ने संवाददाताओं से कहा, "अगर मौजूदा नीतियां जारी रहीं तो भारत को 2030 तक 80-100 लाख टन दालों का आयात करना पड़ेगा।"

देश ने 2023-24 वित्तीय वर्ष में 47.38 लाख टन दालों का आयात किया। गुलाटी ने कहा, "नीतियों में बदलाव होने पर दालों में आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है।" वे राष्ट्रीय राजधानी में भारत दलहन सेमिनार 2024 के मौके पर इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन (आईपीजीए) के कार्यक्रम में बोल रहे थे। आईपीजीए के चेयरमैन बिमल कोठारी ने कहा कि पिछले 3-4 सालों में देश में दालों का उत्पादन करीब 240-250 लाख टन रहा है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में आयात बढ़कर 47 लाख टन हो गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष 2022-23 में यह 24.96 लाख टन था। उन्होंने कहा कि 2030 तक दालों की मांग 400 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है।

यह भी पढ़ें- किसानों को 61 फसलों के ल‍िए 109 नई क‍िस्‍मों की सौगात, व‍िपरीत मौसम में भी होगा अच्‍छा उत्‍पादन

गुलाटी ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की मौजूदा नीतियां धान की खेती के पक्ष में हैं, क्योंकि बिजली और उर्वरक जैसे इनपुट पर भारी सब्सिडी है।

दाल की खेती को प्रोत्‍साह‍ित करने की जरूरत

उन्होंने कहा, "हमारा अनुमान है कि पंजाब में धान की खेती के लिए प्रति हेक्टेयर 39,000 रुपए की सब्सिडी है। यह केंद्र और राज्य दोनों द्वारा बिजली और उर्वरकों पर सब्सिडी के रूप में दी जा रही है।" गुलाटी ने कहा कि दालों और तिलहन की खेती के लिए भी इसी तरह की सब्सिडी दी जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि सरकारी स्वामित्व वाली भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के पास बफर आवश्यकता से 3.5 गुना अधिक चावल का स्टॉक है। चावल की कई किस्मों पर प्रतिबंध के बावजूद देश ने पिछले वित्त वर्ष में 16 मिलियन टन चावल का निर्यात किया।

गुलाटी ने खाद्य फसलों में आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) तकनीक की अनुमति देने का भी समर्थन किया। उन्होंने कहा कि इस तकनीक ने भारत को कपास उत्पादन में तेज वृद्धि हासिल करने में मदद की। खाद्य पदार्थ के निर्यात पर प्रतिबंध का भी विरोध किया और सुझाव दिया कि निर्यात शुल्क होना चाहिए। दाल ही नहीं, भारत घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में खाद्य तेलों का आयात करता है। खाना पकाने के तेल की 50 प्रतिशत से अधिक मांग आयात के माध्यम से पूरी होती है।

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