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उर्वरकों में आत्मनिर्भरता नहीं, संतुलित इस्तेमाल ही असली रास्ता: अर्थशास्त्री गुलाटी

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के लिए रासायनिक उर्वरकों में आत्मनिर्भर होना फिलहाल संभव नहीं है, क्योंकि यूरिया, डीएपी और पोटाश के लिए देश आयात पर निर्भर है। प्रो. अशोक गुलाटी ने उर्वरकों के संतुलित और

Pooja Rai

Pooja Rai·28 Jan 2026· 4 min read

उर्वरकों में आत्मनिर्भरता नहीं, संतुलित इस्तेमाल ही असली रास्ता: अर्थशास्त्री गुलाटी

उर्वरकों में आत्मनिर्भरता नहीं, संतुलित इस्तेमाल ही असली रास्ता: अर्थशास्त्री गुलाटी

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के लिए रासायनिक उर्वरकों में आत्मनिर्भर होना फिलहाल संभव नहीं है, क्योंकि यूरिया, डीएपी और पोटाश के लिए देश आयात पर निर्भर है। प्रो. अशोक गुलाटी ने उर्वरकों के संतुलित और कुशल उपयोग पर ज़ोर देते हुए यूरिया-प्रधान सब्सिडी नीति में सुधार की जरूरत बताई। नीति आयोग के रमेश चंद ने हर जगह 4:2:1 एनपीके अनुपात लागू करने को अवैज्ञानिक बताया।

देश में रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते इस्तेमाल, बिगड़ते मिट्टी स्वास्थ्य और भारी सब्सिडी के बीच उर्वरक नीति को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में उर्वरकों में आत्मनिर्भरता की बात व्यावहारिक नहीं है, बल्कि ज़रूरत इस बात की है कि किसान खाद का सही, संतुलित और ज़रूरत के मुताबिक इस्तेमाल करें।

नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर भारतीय अनुसंधान परिषद (ICRIER) की ओर से मिट्टी के स्वास्थ्य पर जारी एक नए शोध पत्र के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में कृषि और उर्वरक नीति से जुड़े कई बड़े नामों ने अपने विचार रखे।

आत्मनिर्भरता संभव नहीं: अशोक गुलाटी
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) के पूर्व अध्यक्ष और प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. अशोक गुलाटी ने साफ कहा कि भारत के लिए रासायनिक उर्वरकों में आत्मनिर्भर होना फिलहाल संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि यूरिया के लिए गैस, डीएपी के लिए फॉस्फेट रॉक या एसिड और पोटाश (एमओपी) के लिए देश पूरी तरह आयात पर निर्भर है। ऐसे में आत्मनिर्भरता की जगह उर्वरकों के कुशल और संतुलित उपयोग पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।

एनपीके संतुलन बिगड़ा, सब्सिडी जिम्मेदार
गुलाटी ने कहा कि देश में नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) और पोटाश (K) का संतुलन बिगड़ चुका है। इसकी बड़ी वजह यूरिया के पक्ष में झुकी हुई सब्सिडी नीति है। जहां 45 किलो यूरिया का बैग सिर्फ ₹267 में मिलता है, वहीं डीएपी की कीमत करीब ₹1,350 और एमओपी की ₹1,600 प्रति बैग है। सस्ते यूरिया के कारण किसान जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन डाल रहे हैं, जिससे मिट्टी की सेहत खराब हो रही है।उन्होंने सुझाव दिया कि या तो मिट्टी के स्वास्थ्य के आधार पर खाद की मात्रा तय की जाए या फिर उर्वरकों की कीमतों में सुधार किया जाए, क्योंकि केवल सलाह देने से समस्या हल नहीं होगी।

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डीएपी के विकल्प और नई तकनीक पर ज़ोर
प्रो. गुलाटी ने डीएपी के विकल्प के रूप में ट्रिपल सुपर फॉस्फेट (TSP) को बढ़ावा देने की बात कही, जिसमें नाइट्रोजन नहीं होती। उन्होंने यह भी कहा कि जल घुलनशील उर्वरकों को बढ़ावा देने और उन पर सब्सिडी देने से उर्वरकों का बेहतर और सटीक इस्तेमाल संभव है, जैसा कि इज़राइल और अमेरिका जैसे देशों में किया जा रहा है।

4:2:1 एनपीके अनुपात पर मतभेद
कार्यक्रम में नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने एनपीके के असंतुलन को लेकर अलग राय रखी। उन्होंने कहा कि हर जगह 4:2:1 का एनपीके अनुपात लागू करना वैज्ञानिक नहीं है। यह अवधारणा 1950 के दशक में उत्तर-पश्चिम भारत की गेहूं फसल के अध्ययन पर आधारित थी।रमेश चंद के अनुसार, देश के लिए समग्र स्तर पर उपयुक्त एनपीके अनुपात 2.55:1.4:1 होना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि 20 में से 13 राज्यों में नाइट्रोजन का इस्तेमाल जरूरत से कम है, जबकि केवल 7 राज्यों में इसका अत्यधिक प्रयोग हो रहा है।

डीबीटी और तकनीक से नियंत्रण की कोशिश
रमेश चंद ने उर्वरक सब्सिडी में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) का समर्थन किया, लेकिन इसे जमीनी स्तर पर चुनौतीपूर्ण बताया। वहीं, उर्वरक सचिव रजत कुमार मिश्रा ने कहा कि तकनीक के जरिए उर्वरक उपयोग को नियंत्रित किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि एग्रीस्टैक डेटा को जमीन के आकार और फसल से जोड़कर खाद की बिक्री पर नजर रखी जा रही है। हरियाणा में पायलट परियोजना के तहत चार महीनों में 1.2 लाख टन यूरिया और 72 हजार टन डीएपी की बचत हुई है।

मतलब ये कि विशेषज्ञों की राय में उर्वरक नीति का भविष्य आत्मनिर्भरता से ज्यादा संतुलन, तकनीक और मिट्टी की सेहत को केंद्र में रखकर तय होना चाहिए, ताकि किसान की लागत भी घटे और ज़मीन की उर्वरता भी बनी रहे।

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