फोटो क्रेडिट: सोशल मीडिया
पूरी दुनिया में प्रसिद्ध बिहार, मिथिला के मखाने की कीमत पिछले 6 महीने में दोगुनी तक बढ़ चुकी है। रिपोर्ट की मानें तो दुनिया का लगभग 85 से 90 प्रतिशत मखाना भारत में होता है जबकि भारत का 90 प्रतिशत मखाना बिहार में होता है। बिहार के मधुबनी, दरभंगा, सुपौल, सीतामढ़ी, अररिया, कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज मखाने की खेती के लिए जाना जाता है।
हाल ही में बिहार के कृषि विभाग ने ये जानकारी दी है कि बिहार के मिथिला मखाने का दाम छह महीने में बढ़कर दोगुना हो गया है। विभाग का मानना है कि मखाने को "मिथिला मखाना" के नाम से GI टैग मिलने के बाद देश-विदेश में इसकी मांग तेजी से बढ़ी है जिसकी वजह से इसके दाम में इतना उछाल देखने को मिल रहा है। इस वजह से ये खबर बिहार के मखाना किसानों के लिए काफी अच्छी है। बीबीसी के एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल 50-60 हजार टन मखाने के बीज की पैदावार होती है, जिससे 20-25 हजार टन मखाने का लावा निकलता है। मखाना निर्यात की बात की जाए तो भारत से सालाना 100 टन मखाना का निर्यात किया जाता है जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देश सबसे आगे हैं।
मखाने की खेती समझते हैं
मखाने के सीजन की बात करें तो फरवरी से जुलाई तक माना जाता है। लेकिन नवंबर के महीने में नर्सरी बनाकर बीज का छिड़काव कर दिया जाता है। एक हेक्टेयर में अगर खेती करनी है तो 20 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है। फिर नर्सरी में पौधा फरवरी के दूसरे सप्ताह में तैयार हो जाता है। उसके बाद इसे जलजमाव वाले खेत में ट्रांसफर किया जाता है। खेतों में जुलाई तक ये पूरा हो के तैयार हो जाता है जिसके बाद प्रोसेसिंग का काम शुरू होता है। आम तौर पर मछुआरे ही इसकी फसल कटाई का काम करते हैं या फिर और भी लोग करते हैं जो इस काम के लिये स्किल्ड होते हैं।
GI टैग मिलने से क्या फ़ायदा?
किसी भी चीज का GI टैग मिलने से ये होता है कि उपभोक्ताओं में जागरुकता आने की वजह से उस चीज की देश-विदेश में मांग बढ़ती लगती है। सबसे जरूरी बात ये है कि उस ब्रांड की नकल कोई दूसरा नहीं कर सकता, इससे उस प्रोडक्ट की माँग और बढ़ जाती है। GI टैग मिलने का फायदा ये भी होता है कि उत्पादकों को ये भरोसा हो जाता है कि सरकार उस उत्पाद को MSP वाले कृषि उत्पादों की सूची में शामिल करेगा जिससे किसानों को इसका सही दाम मिलेगा। मखाने की कीमत की बात करें तो आज की तारीख में मखाना का बड़ा लावा 600-800 रुपए प्रति किलो तक मिलता है और छोटा लावा 400-500 रुपए प्रति किलो तक मिलता है। लेकिन न्यूट्रिशनल वैल्यू दोनों की एक समान ही होती है। ऐसे में माना जा रहा है कि GI टैग मिलने से दूसरे राज्य के किसान भी इसकी खेती में दिलचस्पी ले रहें हैं क्योंकि अब इसकी खेती उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी की जा रही है।
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Pooja Rai·03 Jun 2024· 3 min read

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