कॉफी बोर्ड और जैन इरिगेशन के बीच MOU, टिशू कल्चर पौधों से बढ़ेगा कॉफी उत्पादन

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देश में कॉफी का उत्पादन बढ़े इसके लिए कॉफी बोर्ड ने एक समझौता किया है. समझौते में शामिल दूसरी पार्टी है कंपनी JISL (जैन इरिगेशन सिस्टम लिमिटेड). समझौते के तहत जेआईएसएल कॉफी के किसानों को उन्नत, उच्च गुणवत्ता वाले और रोग प्रतिरोधी कॉफी पौधे मुहैया कराएगा. कॉफी बोर्ड के सचिव और सीईओ केजी जगदीश ने एक बयान में बताया कि , “दुनिया में पहली बार, हमने कॉफी के लिए टिशू कल्चर तकनीक का मानकीकरण किया है. पिछले कुछ सालों से हम टिशू कल्चर के सहारे लगाए गए कॉफी के पौधों की स्टडी में जुटे हुए थे. वे नियमित किस्मों की तुलना में बहुत आगे हैं.

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उन्होंने कहा कि ज्यादा उत्पादन और बेहतर विकास के लिए टिशू कल्चर तकनीक कॉफी के लिए अच्छी है. समझौते के तहत
जैन इरिगेशन कंपनी, बोर्ड को रॉयल्टी देते हुए पौधे तैयार करेगी और कॉफी किसानों को बेचेगी .

भारत में कॉफी
पेय पदार्थों में चाय के दबदबे के बावजूद भारत में कॉफी अपना जलवा कायम रखने में साल दर साल सफल रही है. ना सिर्फ खपत के मामले में बल्कि कॉफी के उत्पादन के मामले में भी भारत टॉप 7 देशों में है.

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भारत ऐसा इकलौता देश है जहाँ कॉफ़ी छायादार पेड़ों के नीचे उपजाई जाती है. भारत की कॉफी ज्यादा एसिडिक (अम्लीय) नहीं होती. स्वाद और खुशबू के मामले में भी भारतीय कॉफी एक अलग पहचान रखती है. कॉफी के उत्पादन में सबसे आगे हैं दक्षिण भारतीय राज्य. देश के कुल उत्पादन का कर्नाटक में 53 प्रतिशत, केरल में 28 प्रतिशत और तमिलनाडु में 11 प्रतिशत उत्पादन होता है. इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम,मणिपुर,नागालैंड ,मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में भी कॉफी की खेती होती है.

कॉफी का इतिहास

भारतीय कॉफ़ी के इतिहास में भी एक अनोखी महक है. कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया के अनुसार लगभग चार सौ साल पहले भारत में कॉफी की यात्रा शुरू हुई थी. उस जमाने के प्रसिद्ध संत बाबा बुदान यमन से सात जादुई फलियाँ लाए और उन्हें कर्नाटक के चंद्रगिरि पहाडियों पर रोपा. कॉफी बोर्ड के अनुसार इसके बाद से ही भारत में कॉफी की खेती शुरू हुई

छायादार फलों के साथ खेती

भारत में कॉफी की खेती छायादार पेड़ों के साथ की जाती है. कॉफी बागान में लगभग 50 से ज्यादा छायादार पेड़ होते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसे पेड़ ढलवां धरती पर मिट्टी को बांध लेते हैं ताकि भू क्षरण ना हो. इसके अलावा तापमान ज्यादा होने पर कॉफी के पौधों पर पड़ने वाली डायरेक्ट धूप से भी बचाते हैं. भारत में अधिकतर जगहों पर कॉफी के साथ मसालों या फलों के पेड़ ही लगाए जाते हैं क्योंकि इनके पेड़ बड़े बड़े होते ही हैं और उसके साथ किसानों की डबल इनकम भी करा जाते हैं. कॉफी के साथ आपको अक्सर काली मिर्च, इलायची, वैनिला, संतरा तथा केला जैसी फसलों के पेड़ नजर आ जाएंगे. कॉफी की बागवानी के लिए तापमान कितना होना चाहिए, ये इस पर निर्भर करता है कि कॉफी की वैराइटी क्या है. कुछ प्रकार की कॉफीज गर्म जगहों पर भी हो सकती हैं और कुछ के लिए ठंडा मौसम जरूरी होता है. केंट्स, अरेबिका, रोबस्टा,एस.795, कावेरी और एस.एल.एन 9 – ये सब कॉफी की कुछ अच्छी वैराइटीज हैं

जरूरी है पेड़ों की कटाई-छँटाई

कॉफी की खेती में सबसे जरूरी हिस्सा है वक्त पर उसके पेड़ों की कटाई और छंटाई.इससे उनके पेड़ मजबूत होते हैं और उनका विकास सुनियोजित होता है जिसकी वजह से उनकी फल देने की क्षमता भी बढ़ती है. वैसे तो सारी फसलें कीटों की मार से कमजोर होती है लेकिन कॉफी को कीटों से सबसे ज्यादा खतरा होता है. एक बार अगर कीटों ने फसल पर डेरा बनाया, कॉफी की चेरी खराब हो जाएगी.

चेरी से बीन्स, बीन्स से कॉफी

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कॉफी की चेरी आमतौर पर पकने पर लाल हो जाती है और फिर किसान उन्हें तोड़ लेते हैं. कई बार मशीनों का इस्तेमाल भी इन्हें तोड़ने के लिए होता है और कई बार किसान हाथ से ही चेरी तोड़ते हैं. दरअसल, भारत में उगाई जाने वाली कॉफी अक्सर उन ज़मीनों पर होती है जो समतल नहीं है, इस वजह से मशीन से चेरी नहीं तोड़ी जा सकती. लेकिन ब्राजील जैसे देश जहां समतल जमीनों पर कॉफी उत्पादन हो रहा है, वहाँ बड़े पैमाने पर मशीनों का इस्तेमाल हो रहा है. एक कॉफी के पेड़ से औसतन 2 से 4 किलो चेरी निकलती है जिससे 400 ग्राम से लेकर 800 ग्राम बीन्स निकलते हैं.

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