सर्जन की प्रक्रिया बस खेती में होती है, न तो किसी कारखाने में होती है और न किसीं व्यावसाय में।
श्रमिक, मजदूर, व्यावसायिक, कारखानदार की तरह किसान को मानना गलत है। यह सब डिब्बे हैं। किसान इंजन है।
खेती में बचत होने के बाद ही मानवीय सभ्यता का जन्म हुआ, आज भी खेती ही अन्न का मूलाधार है। मनुष्य के लिए अन्न अनिवार्य है। दुसरा कोई कारखाना, व्यावसाय, धंदा बंद होने से बडा फर्क नहीं पड़ता, लेकिन कृषी बंद पड़ने से जरूर फर्क पड़ता है, इसीलिए हम किसान को रेल का इंजन मानते हैं। अन्य घटक रेल के डिब्बे हैं।
किसान सर्जक है
कारखाने में वस्तु का निर्माण होता है, लेकिन वह वस्तु नए वस्तु का निर्माण नहीं करती। खेती में एक बीज बोया तो सौ दानों का निर्माण होता हैं और वही दाने फिर से बोयें जा सकते हैं, जिस से हजारों दाने पाये जाते हैं। यह सर्जन की प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया बस खेती में होती है, न तो किसीं कारखाने में होती है और न किसीं व्यावसाय में।

सर्जन का क्षेत्र होने के कारण खेती यह अन्य क्षेत्रों से अलग है। इसको वर्ग के रूप में देखना गलत होगा। भारत में किसान मालिक है, मालिक को रिस्क लेना पड़ता है। इसी रिस्क के चलते किसानों की आत्महत्या हो रही है, मजदूरों नहीं। किसान मालिक होते हुए भी शोषित है। मजदूर की तरह उसे बार्गेनिंग करने की भी शक्ति नहीं है।
कुल मिलाकर किसान वर्ग की परिभाषा में ठूंसा नहीं जा सकता है।
हमारे देश में वर्ग या जाति की भाषा प्रचलित है। वर्ग संघर्ष या वर्ण संघर्ष की बात की जाती है, किसान इस भाषा में नहीं बैठ सकता। क्योंकि वह सर्जक है।
हमारे यहां किसानों को या तो जाती समझा जाता है, या वर्ग। इसी कारण उनकी मांगे उसी प्रकार की होतीं हैं। कोई खेती को जीवन शैली बताता है, तो कोई दामो की मांग करता है और बजट में हल ढुंढने की कोशिश करता है।
सर्जको को सब से पहले चाहिए होती है, आजादी। उस की बात हमारे नेता नहीं करते। वर्ग और वर्ण की बात करते रहते हैं।
गुलामी की बेड़ियां
सर्जक किन बेड़ियों से बंदिस्त किया गया है?
1) खेत जमीन निर्धारण कानून –
यह कानून मात्र खेती पर लागू है, सभी जमीनों पर नहीं। कारखानदार हजारों एकड़ जमीन ले सकता है, लेकिन किसान को 54, 36, 24, 18 और 8 एकड़ की मर्यादा लगाई गयी है। यह कानून पक्षपात करता है। इससे कई दुष्परिणाम हो रहे हैं।
1) खेत जमीनों के छोटे छोटे तुकड़े हो गये। आज भारत के 85% किसान अत्यल्प भूधारक बन गये हैं।
2) खेती के क्षेत्र में आनेवाला पैसा रुक गया है। इन्व्हेस्टमेंट नहीं हो रही है।
3) इस कानून के कारण भारत में खेती करनेवाली कम्पानियां नही बनी,
जब की सारी दुनिया में कृषी उद्योग कंपनियो द्वारा किया जाता है।
4) इस कानून को असंवैधानिक घोषित करके कोर्ट द्वारा रद्द किया गया था। लेकिन उसे अनुसूची 9 में डालकर लागू किया गया था। असंवैधानिक कानून की किंमत देश चुका रहा है।
सीलिंग के कारण कारखानदारों को जमीन खरीदने में कोई रोक नही लगती यह बात जान लीजिए।
आवश्यक वस्तु कानून-
यह अंग्रेजों का बनाया हुआ एक अध्यादेश था। जो आजाद भारत में ज्यो का त्यो लागू किया गया। यह कानून सरकार को बाजार में हस्तक्षेप करने का अधिकार देता है। इस कानून ने न सिर्फ किसानों को बल्कि सारे देश को सडा दिया। इसे भ्रष्टाचार की जननी कहा जाता है। इस कानून के कई दुष्परिणाम हैं।
1) इस कानून का इस्तेमाल करके भारत में खेती माल की कीमतें बार बार गिराई जाती हैं।
2) इस कानून के कारण भारत में लाइसेन्स, परमिट, कोटा राज आया।
3) प्रशासन में 90 प्रतिशत भ्रष्टाचार मात्र इसी कानून के कारण है।
4) इसी कानून के कारण ग्रामीण औद्योगिकीकरण नहीं हो पाया । किसानों को मूल्य वृद्धि का लाभ नहीं मिला और किसानपुत्रों को स्थानीय रोजगार नहीं मिल सके।
जमीन अधिग्रहण-
सरकार ने हमारी जमीन ले कर कारखानदारों को और राजनैतिक नेताओ को बांटी है। इस कानून पर रोक लगनी चाहिए। रास्ता, जल परियोजना, अस्पताल ऐसी सरकारी योजना के लिए किये जानेवाले अधिग्रहण का हम विरोध नहीं करते लेकिन जमीन लेकर किसीं अन्य प्रयोजन के लिए देने पर रोक लगनी चाहिए। यह कानून किसानो पर टंगती तलवार है, इसी कारण बड़ी इन्व्हेस्टमेंट करने की हिम्मत कोई नहीं करता।
अनुसूची 9-
यह सूची मूल संविधान में नहीं थी। इसे मूल संविधान में संविधान संशोधन कर के जोडा गया था। इस अनुसूची में जो कानून डाले जाते हैं, वह न्यायालय के दायरे के बाहर हो जाते है। ना उन के विरोध में कोर्ट में जाया जा सकता है, और ना कोर्ट कोई फैसला कर सकता है। आज इस अनुसूची में 284 कानून हैं, जिन में 250 मात्र खेती या किसानो के संबंध में हैं। यह सब योगायोग नहीं है। भारत में किसानों को न्याय से वंचित कर दिया गया है।
उपर लिखे तिने कानून अनुसूची 9 में डाल रखे हैं। इसीलिये कोर्ट भी उन्हे खारीज नहीं कर सका। अनुसूची 9 जैसा नियम दुनिया के किसीं भी देश में नहीं है।
हमारे लिये सीलिंग, आवश्यक वस्तु, जमीन अधिग्रहण यह कानून जहरिले सांप हैं। अनुसूची 9 उन सांपो का घर है।
यह तींनो कानून समाप्त करना यह राष्ट्रीय कर्तव्य मानना चाहिए।
सर्जकों के शोषण की यह भारतीय व्यवस्था आजादी के बाद कानूनों द्वारा बना कर रखी गयी है। काँग्रेस ने कानून बनाये। वामपंथी तथा अन्य दलो ने उन का समर्थन किया। आज बीजेपी और उन के साठी इन्ही कानूनों पर मजा मार रहे हैं। किसानों की हत्या के यह सभी जिम्मेवार हैं। मोदी सरकार ने इस वर्ष प्याज, कपास, दालें, सोयाबीन, गन्ना के किसानों को जिस तरह हानी पहुचाई है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। मोदी सरकार के काल में किसानो की हत्याओं का आंकड़ा काफी बढ़ा है।
स्वातंत्र्य या संरक्षण
जो नेता किसानों को ट्रेड युनियन मानते हैं, वह संरक्षण मांगते हैं। दाम बांधो, पेन्शन दो, अनुदान बढ़ाओ, यह सारी मांगे उसी प्रकार की है। वह बजट द्वारा भलाई की अपेक्षा करते हैं।
जो किसानों को सर्जक मानते हैं, वह सरकारी बांधनो से मुक्ति मांगते हैं, वह जानते हैं कि विकास या प्रगति के लिए सुविधा नहीं, आजादी अनिवार्य होती है। अंग्रेजों के नियंत्रण को हटाना गांधी जी ने जितना जरुरी महसूस किया था, उतना ही किसानों पर के बंधन हटाना जरुरी है।
सर्जक को पहले आजादी चाहिए, उस के पश्चात संरक्षण, आजादी के बगैर दिया जानेवाला संरक्षण गुलामी का षडयंत्र होता है।पिंजरे में बंद पंछी को अनार के दाने देने से स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता। पिंजरे का दरवाजा पहले खोलना होगा! किसान सर्जक है, उस की लढाई का उद्देश्य आजादी होना चाहिए।
लेखक अमर हबीब. किसान पुत्र
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फोटो क्रेडिटः अभिजीत गुर्जर