भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अत्यधिक या कम बारिश जैसी मौसम की चरम स्थितियों के कारण फसलों को भारी नुकसान हो रहा है, जिससे पैदावार में कमी आ रही है। इतना ही नहीं, उपज की गुणवत्ता भी कम हो रही है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जून और जुलाई के महीनों में अपर्याप्त वर्षा से अनाज और दालों के उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है जबकि तिलहन फसलें भी कटाई (अगस्त-सितंबर) के दौरान अत्यधिक वर्षा से विशेष रूप से प्रभावित होती हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक अब भी भारतीय खेती पूरी तरह से मानसून पर ही निर्भर है। विभिन्न सिंचाई परियोजनाओं और जलवायु परिवर्तन के असर से बचने के लिए तैयार नई किस्म के बीजों के बावजूद मानसूनी बारिश भारत में खेती के लिए अभी भी अहम है। दक्षिण- पश्चिम मानसून के दौरान होने वाली बारिश खरीफ की फसलों के लिए अब भी बहुत अधिक जरूरी है। खरीफ फसलों के उत्पादन पर अलग अलग क्षेत्रों के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। इसमें पाया गया है कि किसी विशेष समय में कम या अधिक बारिश किस प्रकार विशिष्ट फसलों के उत्पादन को प्रभावित करती है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले साल यानी 2024 के 365 दिन में से 322 दिन मौसम में अति देखी गई जबकि 2023 में 318 दिन ऐसे थे। जब तक इन प्रतिकूल परिस्थितियों से मुकाबला करने के लिए अनुकूल नीतियां नहीं बनेंगी तब तक ऐसी घटनाओं दिनोदिन बढ़ती ही जाएंगी।
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रबी के लिए अच्छी होती है मानसूनी की बारिश
बारिश के पैटर्न बदलने या सूखा आदि पड़ने पर फसल का चक्र बदल जाता है और ऐसे में फसल में कीटों और फसलों से जुड़ी बीमारियां घेर लेती हैं। यह देखा गया है कि पर्याप्त या सामान्य बारिश होने से खेती की उत्पादकता बढ़ जाती है। यह देखा गया है कि मानसूनी की अच्छी बारिश रबी के लिए अच्छी होती है। मिट्टी में पर्याप्त नमी रहने और जलाशय में पानी की पर्याप्त मात्रा में रहने से गेहूं, सरसो और दलहन की बुआई के लिए अनुकूल स्थिति होती है।
खरीफ की फसल दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर
यदि खरीफ की फसल के दलहन, तिलहन, चावल और मोटे आनाज के आंकड़ें देखें तो इनकी सालाना वृद्धि दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर रहती है। यदि अच्छा रहा तो वृद्धि अधिक होती है और ठीक नहीं रहा तो कम होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्पादन इस बात पर निर्भर रहता है कि मानसून कब मेहरबान होता है। यदि जून और जुलाई के महीने में बारिश कम होती है तो सोयाबीन, मक्का और दलहन के लिए मिट्टी की नमी कम रहती है और ऐसे में इन फसलों की बुआई प्रभावित होती है। ऐसे हालात में जब किसान बुआई कर भी देते हैं तो पौधों के बढ़ने की रफ्तार कम हो जाती है। ऐसे में बदलती परिस्थितियों के देखते हुए जलवायु के अनुकूल खेती करनी होगी।
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