तकनीक से तरक्की पार्ट-17: स्प्रिंकलर से आलू और मेंथा की फसल में बढ़ा उत्पादन

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बाराबंकी (उत्तर प्रदेश)। “इस बार पूरे प्रदेश आलू की पैदावार कम हुई है लेकिन हमारी पैदावार बढ़ी है। मेरे एक बीघे में 5 बोरी यानि 25 कुंटल की ज्यादा पैदावार हुई है। अगर इस समय का रेट जोड़े तो 2000 के हिसाब से ये 50 हजार का होता है।” आलू किसान अनिल वर्मा कहते हैं।

अनिल वर्मा यूपी में बाराबंकी जिले की तहसील फतेहपुर के मानिकपुर गांव में रहते हैं। वो आलू खोदकर मेंथा और मेंथा काटकर धान की खेती करते हैं। विपरीत हालातों में भी आलू की बंपर पैदावार के लिए अनिल खेती में किए गए बदलाव को वजह बताते हैं।

“मेरे पास 18 एकड़ जमीन है, लेकिन 4 एकड़ में हमने इस बार स्प्रिंकलर (फव्वारा) सिंचाई का सिस्टम लगााया था। इससे दो फायदे हुए एक तो खुली सिंचाई के लिए नाला नहीं बनाने से जमीन बची दूसरी फव्वारा सिंचाई से आलू की हल्की नमी मिली, जिससे पैदावार ज्यादा हुई। अनिल वर्मा बताते हैं।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अनिल कहते हैं, “फव्वारा सिंचाई का एक फायदा ये भी मिला कि जब दूसरे खेतों में सर्दियों में पाला गिरता था तो हम अपने इस खेत में रात में स्प्रिंकलर चला देते थे, खेत में नमी होने से गिरे तापमान का असर कम हुआ और झुलसा रोग नहीं लगा।”

अनिल ने अब आलू वाले उसी 4 एकड़ के प्लाट में मेंथा यानि पिपरमिंट लगाई है। उनका कहना है बाकी लोगों की अपेक्षा उनकी कम लागत में मेंथा भी शानदार जा रही है।

यूपी में होता है सबसे ज्यादा आलू
उत्तर प्रदेश देश में सबसे ज्यादा आलू की पैदावार करने वाला राज्य है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आकड़ों के मुताबिक देश में औसतन 2.2 से 2.5 मिलियन हेक्टेयर में आलू की खेती होती है और औसतन 550-600 लाख टन का उत्पादन होता है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के साल 2022-23 के अंतिम अनुमानों के मुताबिक देश में इस वर्ष करीब 601.42 लाख टन उत्पादन हुआ था। कृषि जानकारों के मुताबिक उन्नत बीज, बुवाई और सिंचाई के तरीकों में बदलाव करके आलू के उत्पादन को काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है। देश के आलू उत्पादन में यूपी की हिस्सेदारी 28-30 फीसदी तक है।

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Data Source- Statista

खेती से हैं 2-2 टैक्टर और आलीशान घर
अनिल वर्मा आधुनिक किसान हैं । उनके पास खेती में उपयोग किये जाने वाले सभी कृषि यंत्र उपलब्ध हैं। उनके पास दो ट्रैक्टर, खेती में काम आने वाले कृषि यंत्र,घर में गाड़ी सबकुछ है। उनके पास 18 एकड़ जमीन है जिसमें वे सर्दियों के मौसम में आलू बोते हैं, खुदाई के बाद मेथा और मेंथा की कटाई के बाद धान की रोपाई करते हैं। इस प्रकार वे साल में खेत से तीन फसलें लेते हैं।

मेंथा में भी लगाया स्प्रिंकलर सिस्टम
उत्तर प्रदेश में मेंथा की खेती बड़े पैमाने पर होती है। देश की कुल मेंथा पैदावार का 92 फीसदी यूपी में होता है जबकि इसमें बाराबंकी की हिस्सेदारी अकेले 32 फीसदी से ज्यादा है। मेंथा एक सगंध फसल है, जिसके आसवन से निकलने वाला तेल दवाइयों, कॉस्मेटिक, हर्बल प्रोडक्ट समेत कई तरह के खाद्य प्रसंस्करण में उपयोग किया जाता है। आप के टूथपेस्ट और सिर में लगाने वाले तेल में ठंडक का असहास करने वाला यही मेंथा आयल होता है। 90 दिन की ये फसल कैशक्रॉप मानी जाती है। अनिल खुद इसकी बड़े पैमाने पर खेती करते हैं।

मेंथा में भी लगाया स्प्रिंकलर सिस्टम
अनिल ने इस बार करीब 10 एकड़ में मेंथा लगाई है। वे बताते हैं “स्प्रिंकलर से मेंथा कि सिंचाई करने से पैदावार अच्छी होती है। खेत में जलभराव नहीं होता है, ना ही सिंचाई के लिए मजदूरों की जरुरत पड़ती है। स्प्रिंकलर सिस्टम में लगी वेंचुरी के जरिए तरल खाद और कीटनाशक आदि का भी छिड़काव आसानी से हो जाता है।”

स्प्रिंकलर पर यूपी सरकार दे रही 80-90 फीसदी सब्सिडी- उद्यान विभाग
उद्यान विभाग के उप निदेशक कौशल कुमार नीरज बताते हैं” प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत किसानों को ड्रिप, मिनी स्प्रिंकलर, माइक्रो स्प्रिंकलर पर प्रदेश सरकार 80 से 90 फीसदी सब्सिडी दे रही है। वर्तमान समय में 2 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल पर किसानों ने अपना पंजीकरण करवाया है। योजना के तहत 1.54 लाख किसानों को लाभ मिल चुका है।

स्प्रिंकलर लगाने का तरीका
आलू की फसल में स्प्रिंकलर की दूरी 10*10 मीटर होनी चाहिए।
एक लेटरल से दूसरे लेटरल की दूरी 10 मीटर होनी चाहिए।

यूपी में सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए करीब 80 कंपनियां कार्यरत है। अनिल वर्मा के फार्म पर सूक्ष्य सिंचाई सिस्टम लगाने वाली कंपनी जैन इरिगेशन के यूपी हेड रविंद्र वर्मा न्यूज पोटली को बताते हैं, स्प्रिंकलर से कृत्रिम बारिश होती है इससे पानी पत्तियों के ऊपर ही पड़ता है। ऐसे में पौधा अपना भोजन अच्छे से बना पाता है और पौधे की बढ़वार अच्छी होती है। स्प्रिंकलर के माध्यम से खाद भी डाली जा सकती है”

अनिल आगे बताते हैं अगर ड्रिप इरिगेशन ना होती तो ना हमारे यहां ये सब सम्भव ना हो पाता। हम पुरानी पद्धति से ही खेती कर रहे होते, सबके जैसे हमारे यहां भी आलू की कम पैदावार होती।

तकनीक से तरक्की सीरीज – न्यूज पोटली और जैन इरिगेशन की जागरुकता मुहिम है, सीरीज में उन किसानों की कहानियों को शामिल किया जा रहा है, जो खेती में नए प्रयोग कर, नई तकनीक का इस्तेमाल कर मुनाफा कमा रहे हैं। ड्रिप इरिगेशन, आटोमेशन, फर्टिगेशन सिस्टम आदि की विस्तृत जानकारी के लिए संपर्क करें।
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