इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कृषि भूमि में बेटियों को समान उत्तराधिकार देने के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश सरकार से स्पष्ट रुख बताने को कहा है। कोर्ट ने यूपी राजस्व संहिता की कुछ धाराओं को महिला-विरोधी बताते हुए उनकी संवैधानिक वैधता पर सरकार से जवाब मांगा है। सरकार को हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का अंतिम समय दिया गया है, अगली सुनवाई 2 फरवरी को होगी।
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कृषि भूमि में बेटियों को समान उत्तराधिकार देने के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश सरकार से स्पष्ट रुख बताने को कहा है। कोर्ट ने यूपी राजस्व संहिता के उत्तराधिकार से जुड़े कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 2 फरवरी को होगी।
रुख स्पष्ट करे सरकार
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सिद्धार्थ शुक्ला और अन्य की ओर से दायर जनहित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की। कोर्ट ने अपर मुख्य सचिव (राजस्व) को निर्देश दिया है कि वे स्वयं हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करें कि अविवाहित, विवाहित और विधवा बेटियों को कृषि भूमि में समान अधिकार देने के संबंध में सरकार का क्या रुख है।
समानता के अधिकार का उल्लंघन
याचिकाकर्ता सिद्धार्थ शुक्ला ने यूपी राजस्व संहिता की धारा 108, 109 और 110 को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि ये प्रावधान कृषि भूमि के उत्तराधिकार में विवाहित महिलाओं को निचले क्रम में रखते हैं, जो संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
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कैबिनेट की उप-समिति
कोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी जानना चाहा है कि इस मुद्दे पर कैबिनेट की उप-समिति के गठन को लेकर सरकार की क्या मंशा है, उप-समिति के पुनर्गठन में कितना समय लगेगा और उसकी रिपोर्ट कब तक आने की संभावना है। साथ ही, जिन प्रावधानों को महिला-विरोधी और असंवैधानिक बताया जा रहा है, उनकी संवैधानिक वैधता पर भी सरकार से स्पष्ट पक्ष रखने को कहा गया है।
दो सप्ताह का अंतिम अवसर
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि इससे पहले राज्य सरकार की ओर से दाखिल किए गए शपथपत्र अपर्याप्त थे और केवल विधायी इतिहास बताना इस मामले में पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने सरकार को दो सप्ताह का अंतिम अवसर देते हुए स्पष्ट किया है कि इसके बाद कोई और मौका नहीं दिया जाएगा।
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