केंद्र सरकार किसान उत्पादक संगठन (FPO) योजना को 2026 से 2031 तक बढ़ाने की तैयारी में है। सरकार का लक्ष्य FPOs को मजबूत बनाने के लिए उन्हें प्रशिक्षण, पूंजी और नियमों में राहत देना है। अब तक बने 10,000 FPOs ने करीब 9,000 करोड़ रुपये का कारोबार किया है और 52 लाख किसानों को जोड़ा है। सरकार वर्किंग कैपिटल बढ़ाने, नैनो-स्तर की सहायता और बाजार से बेहतर जुड़ाव पर भी काम कर रही है।
केंद्र सरकार किसान उत्पादक संगठन (FPO) योजना को वर्ष 2026 से 2031 तक अगले पाँच साल के लिए बढ़ाने जा रही है। यह जानकारी कृषि सचिव देवेश चतुर्वेदी ने शुक्रवार को CII FPO समिट में दी। उन्होंने कहा कि फरवरी 2020 में शुरू की गई इस योजना के तहत 10,000 FPO बनाने का लक्ष्य रखा गया था, जिसे लगभग पूरा कर लिया गया है, लेकिन अब इन संगठनों को मज़बूत बनाने के लिए योजना का विस्तार ज़रूरी है।
करीब 10,000 FPO बन चुके
कृषि सचिव ने बताया कि अब तक करीब 10,000 FPO बन चुके हैं, लेकिन इनमें से कई संगठन हाल के दो वर्षों में बने हैं, इसलिए इन्हें अभी होल्डिंग यानी मार्गदर्शन और सहयोग की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि सरकार सामुदायिक संस्थाओं और क्रियान्वयन एजेंसियों के ज़रिये इन FPOs को आगे बढ़ाने पर काम करेगी। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार ने FPOs के सामने आ रही व्यावहारिक समस्याओं की पहचान की है। इनमें सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं—क्षमता निर्माण (ट्रेनिंग), पूंजी और कर्ज की उपलब्धता, और कंपनी कानूनों का पालन। इन सभी बातों को नई योजना में शामिल किया जाएगा, ताकि FPO किसानों को बेहतर मुनाफा दिला सकें और मज़बूती से काम कर सकें।
2020 में चित्रकूट से शुरू हुई थी योजना
कृषि सचिव ने कहा कि FPOs के लिए कंपनी अधिनियम (Companies Act) के तहत नियमों का पालन करना एक बड़ी समस्या है। इसे देखते हुए कृषि विभाग ने कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय से अनुरोध किया है कि FPOs के शुरुआती 3 से 5 वर्षों में नियमों के उल्लंघन पर जुर्माना कम रखा जाए। उन्होंने कहा कि नियम जरूरी हैं, लेकिन जब संगठन मजबूत हो जाएँ, तब उनसे पूरी सख्ती से पालन कराया जा सकता है।
समिट में चतुर्वेदी ने बताया कि 2020 में चित्रकूट से शुरू किए गए 10,000 FPOs ने वित्त वर्ष 2024–25 में लगभग 9,000 करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार किया है। कुछ रिपोर्ट अभी आनी बाकी हैं, इसलिए यह आंकड़ा 10,000 करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है। इन FPOs से देश के करीब 52 लाख किसान जुड़े हैं, जबकि देश में कुल किसानों की संख्या लगभग 12–13 करोड़ है।उन्होंने बताया कि इसके अलावा देश में 40,000 से 50,000 FPO ऐसे भी हैं, जो राज्य सरकारों या निजी संस्थाओं के माध्यम से पंजीकृत हैं। यानी कुल मिलाकर FPOs की संख्या काफी बड़ी हो चुकी है।
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FPOs को क्रेडिट गारंटी देने पर विचार
कृषि सचिव ने कहा कि FPOs के लिए वर्किंग कैपिटल यानी काम चलाने के लिए पूंजी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। अभी सरकार की इक्विटी ग्रांट योजना में 30 लाख रुपये की सीमा है, जो बड़े स्तर पर काम करने वाले FPOs के लिए कम पड़ती है। उन्होंने सुझाव दिया कि इसे बढ़ाकर 50 लाख से 1 करोड़ रुपये किया जाना चाहिए, खासकर तब जब FPOs को फसल खरीद, प्रोसेसिंग और किसानों को अग्रिम भुगतान जैसे काम करने हों। सरकार अब इस पर भी विचार कर रही है कि FPOs को क्रेडिट गारंटी या आसान कार्यशील पूंजी कैसे उपलब्ध कराई जाए। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य सरकारें कम शुल्क वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी का पैनल बनाएं, ताकि FPOs नियमों का पालन आसानी से कर सकें।
कुछ FPOs केवल कागज़ों पर मौजूद
कृषि सचिव ने कहा कि FPOs स्थानीय उत्पादों की प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं, जैसे—केले के रेशे, गुड़, मिलेट्स और दालें। ये उत्पाद स्थानीय बाजार के साथ-साथ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी बेचे जा सकते हैं, जो ‘मेक इन इंडिया, लोकल फॉर लोकल’ के विज़न से मेल खाता है। हालाँकि उन्होंने यह भी माना कि कुछ FPOs केवल कागज़ों पर मौजूद हैं और उनमें सिर्फ 3–4 लोग शामिल हैं, जिनका किसानों से कोई वास्तविक जुड़ाव नहीं है। सरकार ऐसे फर्जी FPOs और वास्तव में किसानों के लिए काम कर रहे संगठनों में फर्क करेगी और सक्रिय FPOs को और मज़बूत करेगी।
FPO को मजबूत करने के लिए APEDA का प्लान
इस मौके पर APEDA के सचिव सुधांशु ने बताया कि उनकी संस्था FPO आंदोलन को मज़बूत करने के लिए काम कर रही है, ताकि किसानों के उत्पाद देश और विदेश के बाज़ारों तक पहुँच सकें। उन्होंने कहा कि APEDA की रणनीति तीन हिस्सों में काम करती है—इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट, गुणवत्ता सुधार और बाज़ार से जोड़ना।उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि वाराणसी में FPOs की मदद से सब्ज़ी निर्यात का क्षेत्र चार साल में शून्य से बढ़कर 1,200 हेक्टेयर तक पहुँच गया है। वहीं पुणे की पुरंदर हाइट्स संस्था के अंजीर उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं और यूरोपीय यूनियन से ऑर्डर भी मिले हैं।
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