पपीता और हरी मिर्च की खेती से सालाना 80-90 लाख रुपए कमा रहा महाराष्ट्र का ये किसान

नंदूरबार (महाराष्ट्र)। “मेरे परिवार के पास पहले सिर्फ 4 एकड़ जमीन थी, जिसमें कपास आदि की खेती होती थी, लेकिन उसमें कुछ बचता नहीं था। फिर हमने पपीता और मिर्च की खेती शुरू की, जिससे मुझे बहुत फायदा हुआ। अब मेरे पास 32 एकड़ जमीन है और साल में 80-90 लाख रुपए का मुनाफा कमा लेता हूं।” यह कहना है पपीते के बाग में खड़े अर्जुन भाईदास पेटकर का।

अर्जुन के पिता, भाईदास पर्वत कहते हैं, “वो सस्ता दौर था, 4 एकड़ जमीन से मुश्किल से 40-50 हजार रुपए मिलते थे, लेकिन अब पपीता और मिर्च की खेती से अच्छा मुनाफा हो रहा है।”

अर्जुन महाराष्ट्र के नंदूरबार जिले के उमर्दे गांव में रहते हैं। साल 2024 में उनके पास 5 एकड़ में पपीता और 6 एकड़ में हरी मिर्च लगी है। अर्जुन के मुताबिक, वह ताइवान रेड लेडी 786 पपीते की खेती करते हैं, जिसमें एक एकड़ में लगभग 1000 पौधे लगाए जाते हैं।

“पपीते का एक पौधा औसतन 40-50 किलो फल देता है। एक एकड़ से औसतन 50 टन फल मिल जाते हैं। वर्तमान में पपीते का रेट 15 रुपए किलो है, लेकिन अगर 10 रुपए किलो का भी रेट मिलता है तो 5-6 लाख रुपए की कमाई होती है। इसमें एक लाख रुपए की लागत निकालने के बाद भी 4-5 लाख रुपए की शुद्ध बचत होती है।” अर्जुन पपीते की खेती के आंकड़े बताते हैं।

अर्जुन के खेतों में पपीते के पौधे फल से लदे हुए हैं, और जमीन से मुश्किल से 4 इंच की दूरी पर ही फल लगने शुरू हो गए थे। फलों को दिखाते हुए अर्जुन कहते हैं, “यह ताइवान रेड लेडी 786 किस्म है, जिसकी पौध मैंने जलगांव में जैन इरिगेशन से खरीदी थी। उनके पौधे बायोडिग्रेडेबल कप में आते हैं, जिससे पौधे और जड़ें रोगमुक्त रहते हैं और इसलिए पौधे जल्दी नहीं मरते और पैदावार भी अच्छी होती है।”

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रेड लेडी ताइवान-786 की खूबियां

पपीते की लोकप्रिय किस्म ताइवान-786 रेड लेडी की खेती अर्जुन करते हैं। यह किस्म गायनो-डायोसियस है, जिससे पपायारिंग स्कॉट वायरस से भी मुक्ति मिलती है और इसके बावजूद अच्छा उत्पादन मिलता है। इस किस्म के पौधे में नर और मादा दोनों होते हैं, इसलिए हर पौधे से अच्छा उत्पादन मिलता है। इसके फलों का परिवहन भी आसान होता है, जिससे दूर-दराज के बाजारों तक फसल भेजने में कोई दिक्कत नहीं होती है।

अर्जुन अपनी सफलता का श्रेय तकनीक को देते हैं। वह कहते हैं, “हमारी खेती में 4 बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं: 1. सही किस्म का चयन, 2. रोपाई का सही समय, 3. पौधों के बीच पर्याप्त दूरी, 4. सटीक और समय पर सिंचाई।”

ड्रिप सिंचाई

अर्जुन मानते हैं कि पपीता एक नाजुक फसल है, और किसानों को अक्सर तना गलन समेत कई रोगों से नुकसान होता है। इसे रोकने के लिए वह ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा, पौधों को भरपूर पोषण देने के लिए दो लाइनों के बीच एक अतिरिक्त ड्रिप लाइन भी लगाई जाती है।

हरी मिर्च ने भी कराई खूब कमाई

मीठे पपीते के साथ-साथ हरी मिर्च की खेती ने भी अर्जुन और उनके परिवार को मुनाफे की नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। गुजरात की सीमा से लगे नंदूरबार जिले की अनुकूल जलवायु में पपीता और मिर्च की खेती ने क्रांति ला दी है। यहां हजारों हेक्टेयर जमीन पर यह फसलें लहलहा रही हैं।

अर्जुन के मुताबिक, वह हरी मिर्च में गौरी (Green Chilli Gauri) और शारव किस्म (Green Chilli Variety Sharvh) की खेती करते हैं, जिससे बंपर उत्पादन होता है और मांग भी खूब रहती है।

अर्जुन कहते हैं, “अभी हमने पिछले हफ्ते ही 40-50 रुपए किलो के हिसाब से हरी मिर्च बेची है। 6 एकड़ में 200 क्विंटल का उत्पादन मिला है। यानी 8-10 लाख की हरी मिर्च मैं बेच चुका हूं, जबकि अभी इतनी ही मिर्च और निकलेगी। यानी 6 एकड़ में मुझे 20-25 लाख रुपए की आमदनी हो जाती है।”

तकनीक से तरक्की

“सीरीज के हमारे सफल किसान अर्जुन भाई पेटकर की प्रेरणादायक कहानी यह साबित करती है कि सही जानकारी, आधुनिक तकनीक और मेहनत से कोई भी किसान अपनी जिंदगी बदल सकता है। ये फलों से लदे हरे-भरे पेड़ उनकी मेहनत और सफलता की सबसे बड़ी मिसाल हैं।”

खेती किसानी की रोचक जानकारियों के लिए देखते रहिए न्यूज पोटली। पपीते की खेती से जुड़ा कोई सवाल है तो कमेंट में पूछिए

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