चाय के बागानों का कड़वा घूंट कौन पीता है?

230 रुपये दिन की दिहाडी है चाय के बागानों में काम करने वाले मजदूरों की, सरकार और बागान मालिक मिलकर इन श्रमिकों के लिए योजनाओं के तहत काम करते हैं फिर भी मजदूर वर्ग है ना-खुश। न्यूज पोटली को इसके पीछे के तीन कारण मिलें पहली नेपाल, दूसरी जलवायु परिवर्तन और तीसरी पैदावार और क्वालिटी के मुताबिक रुपये नहीं मिल पाना।

सिलीगुड़ी, दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी: “34 साल मैंने इन बागानों में काम किया मेरे रिटायर होने के बाद मेरा बेटा करता है फिर उसका बेटा और बहू करेगी, चाय के बागानों में काम करना एक गुलामी ही है।” बागडोगरा टी-इस्टेट में कई साल पहले तक काम करने वाले रतिया बताते हैं।

पश्चिम बंगाल में सिलीगुड़ी जलपाइगुड़ी समेत कई ज़िलों में चाय की खेती होती है। इन चाय के बागानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए काम करना एक मजबूरी है, सर के ऊपर छत बनी रहे इसके लिए पीढ़ी तक लोग इन बागानों में काम करते रहते हैं। रतिया भी उन मजदूरों में से एक हैं।

हालांकि राज्य सरकार की एक स्कीम के बाद यहां काम करने वाले लोगों को थोड़ी राहत ज़रूर मिली है। सरकार ने यहां काम करने वाले पर्मानेंट वर्कर्स के लिए घर बनाने का ऐलान किया है। स्कीम के तहत सरकार ने 2020-21 और 2022-23 के बजट को मिलाकर करीब 500 करोड़ रुपये का बजट देने का ऐलान किया है। न्यूज़ पोटली ने जब इस बाबत यहां के लोगों से बात की तो उनका कहना था कि इससे उनको कोई खास फायदा नहीं होगा, क्योंकि ज़मीन का मालिकाना हक तो अभी भी उनके पास नहीं होगा।

नार्थ बंगाल और चाय के बागानों पर लंबे समय से लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं “ एक सेस्टनेबल डेवलमेंट की जरूरत है जिससे चाय के बागान, यहां के मजदूर और मालिक सब लोग बने रहे क्योंकि एक भी जाने से ये सिस्टम गिर जाएगा। सरकार की जमीन को लीज पर लेके यहां चाय की खेती कराते हैं, और मालिक लोग मजदूरों को चावल, गेंहू देते हैं जिससे उनका घर भी चलता रहे। वहीं मजदूरों का कहना है कि एक प्रीमियम किस्म की चाय बाजार में 500 रुपय में बिकती पर उनको मिलता है उसमें से 2 से 3 रुपये।”

एक दशक पहले तक दार्जिलिंग चाय उद्योग में लगभग हर साल 11 मिलियन किलो चाय पैदा होती थी जो साल 2021-22 में घट कर 7.5 मिलियन किलो के करीब रह गई। हालात ऐसे बन गए हैं कि 40-50 फीसदी बागान खरीददार तलाश रहे हैं। मौजूदा परिस्थिति में ये उद्योग 55 हजार स्थायी मजदूरों का खर्च उठाने में सक्षम नहीं है। इनके अलावा करीब 12 हजार अस्थायी मजदूर भी इस उद्योग से जुड़े हैं। दार्जिलिंग टी एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक, दार्जिलिंग के चाय उद्योग से 67 हजार लोगों को प्रत्यक्ष और करीब चार लाख लोगों को परोक्ष तौर पर रोजगार मिला है। यहां काम करने वाले मज़दूरों को एक दिन का मेहेनताना महज 232 रुपये मिलते हैं। हालांकि स्टेट्स की तरफ से उनके रहने और अनाज की व्यवस्था की जाती है।

रोहित शेख युवा है और चाय के बागानों में मजदूरी करते हैं, बताते हैं “कोई एक काम नहीं होता है बहुत से काम होते हैं जैसे लकड़ी काटना, चाय की पत्ती को गाड़ी तक पहुचाना या लोड करना। इस तरह दिन का हमको 230 रुपये मिल जाते हैं। लेकन ये काम पूरे महीने नहीं मिलता है अगर दो हफ्ते काम किया हैं तो दूसरे हफ्ते  का काम खत्म होने पर पहले हफ्ते का बिल क्लियर होता है।”

इन चाय बागानों से जुड़ा एक बड़ा मजदूर वर्ग महिलाओं का है। चाय की पत्ती तोडने का ज्यादातर काम महिलाएं ही करती है, वजन सर पर लादे लादे इनके सर के बाल तक झड़ गए और कई बीमारियां भी लग गई। उनका कहना है पूरी उम्र इसी में निकल गई अब इतने पैसों में इलाज कराएं या घर चलाएं।

इस मुद्दे का गहराई से समझा तो न्यूज पोटली को इसके पीछे के तीन कारण मिलें पहली नेपाल, दूसरी जलवायु परिवर्तन और तीसरी पैदावार और क्वालिटी के मुताबिक रुपये नहीं मिल पाना। दरअसल दार्जिलिंग नेपाल के साथ अपनी सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है, जो 101 किमी है। पड़ोसी देश की कम गुणवत्ता वाली चाय की पत्तियां भारत में आ रही हैं, जिससे स्थानीय चाय बागान मालिकों को काफी नुकसान हुआ है। आंकड़ों में समझाएं तो जनवरी से मई 2022 में नेपाल से तकरीबन 45 लाख किलो चाय का आयात हुई जबकि इसी अवधि में 2021 में ये मात्रा 19 लाख किलो थी, यानी एक साल में नेपाल से दोगुने से अधिक चाय भारत मंगाई गई। इससे दार्जिलिंग चाय की मांग घट रही है।

हर फसल की तरह चाय पर भी बदलते मौसम का असर देखने को मिला है। ग्लोबल जर्नल ऑफ बायोलॉजी, एग्रीक्लचर एण्ड स्वास्थय विज्ञान की रिसर्च के मुताबिक क्लाइमेट चेंज का असर दार्जिलिंग में चाय के उत्पादन पर पड़ा है। रिसर्च के मुताबिक इस एरिया का तापमान पिछले कुछ दशकों में 0.51 degree Celsius तक पढ़ गया और इसकी वजह से पैदावार में कमी आई। लेकिन इस दौरान लागत बढ़ी है, और लागत के मुताबिक पैसा नहीं मिल पाना ही इस इंडस्ट्री के गहरे आर्थिक संकट की बड़ी वजह है जिसका खामियाजा यहां काम करने वाले मज़दूरों को भी भुगतना पड़ रहा है। क्योंकि उनका मेहनताना नहीं बढ़ पा रहा।

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