दिसंबर से जनवरी के बीच पाला और शीतलहर रबी फसलों के लिए बड़ा खतरा होती है। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि वे खेतों में नमी बनाए रखें, संतुलित खाद का उपयोग करें, कीट-रोगों की निगरानी करें और पुआल या घास से मल्चिंग करें। गेहूं, सरसों, दलहन, सब्ज़ी, बागवानी फसलों और पशुओं को ठंड से बचाने के लिए समय पर सिंचाई, उचित दवा और वैज्ञानिक सलाह लेकर ही उपाय अपनाने की जरूरत है।
दिसंबर के मध्य से लेकर जनवरी के अंत तक का समय किसानों के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है। इस दौरान पाला और तेज शीतलहर का खतरा सबसे ज़्यादा रहता है। जब तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है, तो रबी की फसलों को भारी नुकसान हो सकता है। गेहूं, जौ, आलू, सरसों, मटर, टमाटर, फूलगोभी, बैंगन, मिर्च और कद्दू वर्ग की सब्ज़ियां इस मौसम में सबसे अधिक प्रभावित होती हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र-2, कटिया (सीतापुर) के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. दया एस. श्रीवास्तव के अनुसार, पाले की स्थिति में पौधों की कोशिकाओं के अंदर बर्फ जम जाती है, जिससे कोशिकाएं फट जाती हैं और पौधा झुलसकर मर सकता है। इसलिए इस मौसम में सही समय पर सही उपाय करना बहुत जरूरी है।
खेती के लिए सामान्य सलाह
किसानों को अपने खेतों को साफ रखना चाहिए और खरपतवारों को समय पर निकाल देना चाहिए। खाद और उर्वरक का इस्तेमाल मृदा स्वास्थ्य कार्ड के अनुसार ही करें। नाइट्रोजन की अधिक मात्रा ठंड में फसलों को कमजोर बना देती है, इसलिए इसका जरूरत से ज्यादा प्रयोग न करें। जैव उर्वरकों और बायो एनपीके को प्राथमिकता दें। खेत में फसल के अवशेष न जलाएं और जड़ों के आसपास पुआल, सूखी घास या पॉलीथीन शीट बिछाकर मल्चिंग करें, ताकि मिट्टी की गर्मी बनी रहे।
कीट और रोगों से बचाव के लिए खेत की नियमित निगरानी जरूरी है। रस चूसने वाले कीटों से बचाव के लिए पीले और नीले चिपचिपे पाश 25-30/ एकड़ सभी फसलों में लगाएं। पत्ती खाने वाले और फल बेधक कीटों के लिए फेरोमोन ट्रैप और सोलर लाइट ट्रैप का इस्तेमाल करें।कीट नियंत्रण हेतु नीम या करजं के तेल का छिड़काव 2 मिलीली/ली पानी के हिसाब से करें।
गेहूं, सरसों और दलहन की देखभाल
गेहूं की पहली सिंचाई बुवाई के 21–25 दिन बाद जरूर करें और उसी समय खरपतवार नियंत्रण भी करें। खरपतवार नियंत्रण के लिए 2,4-D, क्लोडिनोफॉप, मेट्रीब्यूजीन जैसे शाकनाशी 2-3 पत्ती की अवस्था पर विशेषज्ञ की निगरानी में ही उपयोग किए जाएँ। देर से बुवाई के लिए HD-3298 किस्म उपयुक्त मानी गई है। जिंक सल्फेट के प्रयोग से जड़ों का विकास बेहतर होता है।
सरसों की फसल में पौधों की संख्या ज्यादा हो तो विरलीकरण जरूर करें। पर्णीय धब्बा रोग दिखने पर मेटालैक्सिल+मैकोंजेब का छिड़काव करें। सरसों मे सल्फर का प्रयोग अवश्य करें। चना और मसूर की फसल में फ्यूजेरियम विल्ट और ब्लाइट से बचाव के लिए कापर आक्सी क्लोराइड 2 ग्राम/ली पानी का एक सुरक्षात्मक छिड़काव करें ।
सब्ज़ियों की फसल में सावधानी
सब्ज़ियों में रस चूसक कीटों से बचाव के लिए पीला चिपचिपा पाश, लकड़ी की राख का बुरकाव और नीम तेल का छिड़काव करें। रोगों से बचाव के लिए जैविक घोल या कॉपर आधारित दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। अत्यधिक प्रकोप की स्थित मे इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मिली/ली पानी का छिड़काव करें। रोग प्रबंधन हेतु सयूडोमोनास 5मिली/ली पानी, बैसिलस सबटिटलिस 5 मिली/ली पानी या कापर आक्सी क्लोराइड 2 ग्राम/ली पानी का छिड़काव करें।
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पशुओं की देखभाल
ठंड के मौसम में पशुओं की सुरक्षा भी बेहद जरूरी है। पशुशाला को चारों ओर से ढककर रखें और साफ-सफाई का ध्यान दें। पशुओं को जूट के बोरे पहनाएं और बैठने की जगह पर शाम को पुआल बिछाएं। आहार में मिनरल मिक्सचर, गुड़ और चना शामिल करें। दूध देने वाले पशुओं को सुबह-शाम गुनगुना पानी देना लाभकारी होता है।
बागवानी फसलों की सुरक्षा
आम और अमरूद में काले फफूंद से बचाव के लिए कार्बेंडाजिम + मैकोंजेब फफूदनाशक 2 ग्राम/ली एवं इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मिली/ली+ नीम का तेल 2मिली/ली का एक सप्ताह के अंतराल पर छिड़काव करें।केले की पत्तियों मे झुलसा (सिगाटोका) रोग से बचाव हेतु प्रोपीकोनाजोल 2 मिली/ली पानी का छिड़काव करें। नीबू की पत्तियों में सिट्रस कैंकर (भूरा धब्बा) से बचाव हेतु कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 45 ग्राम व स्ट्रेपटो माइसीन सल्फेट 2 ग्राम को 15 ली पानी मे मिलाकर छिड़काव करें।
कोहरा और पाला से बचाव के उपाय
खेतों में हल्की नमी बनाए रखें। रात के समय खेतों के किनारे सूखी घास या नीम की पत्तियों का धुआं करें। पाला पड़ने की स्थिति में स्प्रिंकलर से लगातार पानी का छिड़काव करें।
1. जैसे थायोयूरिया (Thiouria) खुराक: 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। इससे कोहरे से होने वाले नुकसान के प्रति सुरक्षा मिलता है।
2.घुलनशील सल्फर (80% WP) | 2 से 2.5 ग्राम प्रति 1.5 से 2 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़। ये पत्तियों का तापमान लगभग 2-2.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ा देता है। |
3.व्यावसायिक सल्फ्यूरिक एसिड | 0.1% घोल (10 मिलीलीटर 10 लीटर पानी में)। | पत्तियों का तापमान बढ़ाता है। (केवल विशेषज्ञ की देखरेख में अत्यंत सावधानी से प्रयोग करें।)
4.पत्तियों में जीवाणु झुलसा रोग से बचाव हेतु कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (COC) 2 ग्राम/ली का छिड़काव करे |
5.पोटेशियम नाइट्रेट (1%) या 1% पोटाश | पर्णीय छिड़काव (Foliar Spray) करें। | कोशिका के घोल की सान्द्रता बढ़ाकर पाले के तनाव के प्रति पौधे की सहनशीलता को बढ़ाता है। |
मौसम की भविष्यवाणी पर नजर रखें
डॉ. श्रीवास्तव ने किसानों को सलाह दी है कि मौसम की भविष्यवाणी पर लगातार नजर रखें और किसी भी रासायनिक दवा के प्रयोग से पहले अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या कृषि विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें। सही समय पर सही कदम उठाकर पाला और ठंड से फसलों को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
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