भारतीय भोजन व्यवस्था में आदिकाल से शाकाहार को अधिक महत्व दिया जाता रहा है। फल सदियों से हमारे भोजन का अभिन्न अंग रहे हैं। प्राचीनकाल में हमारे पूर्वज फलों पर अधिक निर्भर रहते थे। फलों का उपयोग आदि मानव के समय से होता आया है। प्राचीन ग्रंथों में कंद-मूल पर मानव की निर्भरता का वर्णन मिलता है। सभ्यता के प्रारम्भ में मनुष्य जंगली फल खाता था। मध्यकाल में इनके बागान अस्तित्व में आये और अब वैज्ञानिक विधियों का उपयोग करके फलों का मौसमचक्र न होने पर भी फल प्राप्त करना संभव हो गया है। साधारणतया फल का विकास फूल से होता है। फल एक निषेचित, परिवर्तित एवं परिपक्व अंडाषय होता है। सामान्यता फल तीन प्रकार के होते हैं-साधारण फल, गुच्छेदार फल और बहुखण्डित फल। कुछ फल बीजरहित या बीजविहीन होते हैं जैसे कि केला, अनन्नास। फल, प्रकृति द्वारा प्रदत्त मानव को स्वस्थ रहने के लिए दिया गया एक अनुपम उपहार है। हालांकि आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ में फल का महत्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। प्रस्तुत लेख में फलों की उपयोगिता पर चर्चा की गई है।

वर्तमान में फलों की अपेक्षा मिठाइयों एवं फास्टफूड का प्रचलन तेजी से बढ़ता जा रहा है, जिसके कारण पोषण संतुलन बिगड़ने लगा है। इसके साथ ही स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ने लगी है। फलों का उपयोग करके कई असहज रोगों का उपचार किया जा सकता है। कुछ फलों के पौधे ऐसे हैं जिनकी जड़, तना, छाल, फूल एंव फल संजीवनी के समान औषधीय गुणों से युक्त हैं। फलों में अनेक प्रकार के पोषक तत्व पाए जाते हैं। ये विटामिन्स तथा खनिज लवण से भरपूर होते हैं। फलों का एक विषेष गुण यह भी है कि ये पोषण देने के साथ ही सुपाच्य भी होते हैं। फलों में रेषा होने के कारण ये अन्य भोज्य पदार्थो के पाचन में भी सहायता करते हैं। शरीर में अप्राकृतिक एवं अनुपयोगी भोजन से उत्पन्न होने वाले रोगों को फलों के सेवन द्वारा जड़ से दूर किया जा सकता है।
अतः फल उपयुक्त आहार के साथ-साथ सही औषधि का भी कार्य करते हैं। यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉक्टरों से बेहतर इलाज संतुलित आहार करता है।
स्वास्थ्य संबंधी फायदे
सामान्य जीवन में दांतों से लेकर आंतों तक, गुर्दो से लेकर आँखों तक शरीर के प्रत्येक हिस्से को फलों के उपयोग से फायदा पहुँचता है। रोगी के लिए फलों से बढ़कर कोई अच्छा आहार नहीं है और निरोगी के लिए इससे बेहतर कोई भोज्य पदार्थ भी नहीं है। शहरी सभ्यता के विकास के साथ फलों के रस का प्रचलन शरू हुआ, लेकिन फलों से होने वाले फायदे इनके रस से नहीं मिल सकते। फलों का रस पीने से उनमें मौजूद शुगर रक्त में तुरंत मिल जाती है, जो काफी हानिकारक हो सकती है। फल खाने से यह समस्या नहीं आती है। फलों के जूस में फाइबर नहीं के बराबर या बहुत कम होता है। अतः जूस पीने की अपेक्षा फल खाना ज्यादा लाभदायक होता है। वर्तमान समय में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग करके प्रत्येक मौसम के फल, वर्षभर प्राप्त किए जा सकते हैं। हमेशा ताजे व मौसमी फलों को प्राथमिकता देनी चाहिए। ताजे फलों की गुणवत्ता शीतगृह में रखे हुए फलों की अपेक्षा ज्यादा अच्छी होती है।
फल खाने से दांत साफ एवं मसूड़े मजबूत रहते हैं। खट्टे फल जैसे कि नींबू, संतरा, आंवला, आदि विटामिन ‘सी‘ के स्रोत होते हैं। लाल, पीले फल जैसे कि पपीता, आम, टमाटर, सेब आदि कैरोटेनॉयड्स से भरपूर होते हैं। केला, अंगूर, पपीता आदि फलों में फोलिक एसिड पाया जाता है। यह लाल रक्त कणिकाओं के बनने तथा डीएनए एवं आरएनए के संष्लेषण एवं मरम्मत में सहायक होता है। ज्यादातर फलों में वसा, सोडियम, और कैलोरी सामान्यतः कम पायी जाती है, कोलेस्ट्रॉल तो नहीं के बराबर होता है।
फलों में पाए जाने वाला पोटेषियम रक्तचाप सामान्य बनाए रखने में मदद करता है। विटामिन सी शरीर के सभी ऊतकों की मरम्मत के लिए महत्वपूर्ण है। यह कटे हुए घाव भरने में मदद करता है तथा दांतो और मसूड़ों को स्वस्थ रखता है। फलों में पाए जाने वाला फोलेट, लाल रक्त कोषिकाओं के निर्माण में मदद करता है। फलों में फाइबर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो कि रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करके हदय रोग को कम करने में मदद करता है। भोजन करने के उपरांत शरीर में मुक्त कण (फ्री रेडिकल) बनते हैं जो कि हानिकारक होते हैं तथा शरीर में बुढ़ापे के लक्षण विकसित करते हैं। फलों के सेवन से मुक्त कण नष्ट हो जाते हैं, जिससे शरीर में रोग प्रतिरोध क्षमता का विकास होता है तथा शरीर की रक्षा में मदद मिलती है। परिणामस्वरूप शरीर युवा बना रहता है। घर से बाहर यात्रा में सामान्यतः हमें ऐसे भोजन का उपयोग करना पड़ता है, जिसकी गुणवत्ता की जानकारी हमें नहीं होती, ऐसी स्थिति में फलों का उपयोग करके पाचन संबंधी रोगों से बचा जा सकता है।
फलों का सेवन किस समय किया जाये यह भी महत्वपूर्ण होता है। उदाहरणार्थ दैनिक जीवन में नींबू के बहुत से उपयोग हैं। भोजन से पहले सेंधा नमक के साथ नींबू लेना एक औषधि के समान है।
इसी प्रकार अनार रक्त संचार वाले रोगों में लाभदायक होता है तथा जोड़ों के दर्द को कम करता है। यह गठिया तथा वात रोग (Arthritis) में भी लाभकारी है कैंसर की रोकथाम में भी सहायक है। अनार खाने से आमाषय, तिल्ली और यकृत की दुर्बलता, संग्रहणी, दस्त, उल्टी तथा पेट दर्द आदि ठीक हो जाता है। आम भी हमें स्वस्थ रहने में कई प्रकार के मदद करता है। इसके उपयोग से पाचन क्रिया मजबूत होती है, पेट साफ रहता है, स्मरण शक्ति बढ़ जाती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता हैं आम का अचार रक्त पित्त को दूर करने में सहायता है। आम की गुठली का चूर्ण अस्थमा, दस्त, पुरानी पेचिस, बवासीर और गोलकृमिक के लिए प्रभावी दवा के रूप में सेवन किया जा सकता है। यह चिंता का विषय है कि बढ़ते हुए औद्यौगिकीकरण तथा शहरीकरण के फलस्वरूप फलदार पौधे काफी तेजी से नष्ट हो रहे हैं।
आम
आम में उच्च मात्रा में पैक्टिन होता है, जो कि रक्त में कोलेस्ट्रॅाल के स्तर को कम करने में योगदान देता है। पैक्टिन प्रोस्टेट कैंसर के विकास को रोकने में भी सहायक है। आम में प्रचुर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जिसमें आम कोलोन कैंसर तथा ल्यूकीमिया में फायदेमंद है। आम में पाए जाने वाले तत्व क्यूर्सेटिन तथा एस्ट्रागालिन कैंसर से बचाव करने में सहायक हैं। आम में विटाामिन ‘ए‘ और विटामिन ‘सी‘ की उच्च मात्रा होती है।
विटामिन ‘सी‘ शरीर के अंदर कोलेजन प्रोटीन का उत्पादन करने में मदद करता है। अतः आम खाने से प्राकृतिक बुढ़ापे की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। यह विटामिन ‘सी‘ की कमी से होने वाले संक्रमण से भी बचाता है। विटामिन ‘ए‘ आँखों के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है। आम में आयरन भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो कि एनीमिया के लिए फायदेमंद होता हैं। आम में बीटा कैरोटीन नामक कैरोटीनॉयड भी पाया जाता है जो प्रतिरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ बनता है। अतिरिक्त बीटा कैरोटीन शरीर के अंदर विटामिन ‘ए‘ में परिवर्तित हो जाता है। आम अपचन और अतिरिक्त अम्लता जैसी समस्याओं को दूर करने में भी सहायता होता है।
अमरूद
अमरूद शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी दूर करते हैं। यह मधुमेह को नियंत्रित करने में उपयोगी है। इसमें उच्च मात्रा में फाइबर पाया जाता है और यह कार्बोहाइड्रेट के अवषोषण में सुधार लाता है। इन्सुलिन के स्तर में स्थिरता बनाये रखता है। अमरूद को राख या बालू में भून (सेंक) कर खाने से काली खांसी ठीक होती है। अमरूद पर नमक और काली मिर्च लगाकर खाने से कफ संबंधी रोग ठीक हो जाते हैं। इसके कोमल पत्तों के काढ़े में काली मिर्च मिलाकर पीने से बुखार में आराम मिलता है। यह विटामिन ‘सी‘ का अच्छा स्त्रोत है। यह स्कर्वी को नियंत्रित करने में भी मदद करता है।
जामुन
जामुन से भूख बढ़ती है और पाचन क्रिया ठीक करता है। इसका खट्टापन और अम्लीय गुण रक्तदोषों को दूर करता है। इसमें पोटेषियम की मात्रा अधिक होती है। पोटेषियम खनिज से दिल का दौरा, उच्च रक्तचाप और स्ट्रोक आदि का खतरा कम होता है। जामुन में एंटीऑक्सीडेन्ट्स विशेष रूप से फ्लेबोनाइड्स पाए जाते हैं, जो स्मरण शक्ति ठीक रखने में सहायक हैं इसके नियमित सेवन से रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है। पेट दर्द और दस्त होने पर जामुन के रस में सेंधा नमक मिलाकर पीने से फायदा होता है। जामुन पर नमक डालकर खाने से अपच में भी फायदा होता है। यदि उल्टियाँ आ रही हों तो जामुन का शर्बत देने से लाभ होता है। लीवर रोगों व रक्त विकारों में जामुन के ताजा फलों के रस में शहद मिलाकर सेवन करने से राहत मिलती है।
बेल
बेल के गूदे का उपयोग पेचिश, दस्त तथा अन्य पेट के विकारों में किया जाता है। पत्तियाँ पेप्टिक अल्सर और श्वसन संबंधी रोगों के उपचार में उपयोगी हैं। बेल की जड़ों का प्रयोग सर्पविष, घाव भरने तथा कान संबंधी रोगों के इलाज में किया जाता है।
महुआ
महुआ के फलों को उपयोग रक्त संबंधी रोगों में किया जाता है। महुआ की छाल का उपयोग कुष्ठ रोग के इलाज तथा घावों को ठीक करने के लिए किया जाता है। इसके फूलों का खांसी, मिचली और हृदय से संबंधित रोगों के इलाज में उपयोग किया जाता है। महुआ के तेल का उपयोग साबुन बनाने के लिए भी किया जाता है।
खिरनी
इसके फल शरीर में शीतलता लाते हैं। खिरनी का तेल औषधीय गुणों से भरपूर है। शरीर के दर्द में खिरनी की छाल को उबालकर उस पानी से नहाना लाभप्रद होता है। खिरनी पीलिया, बुखार, जलन, मसूढ़ों में सूजन, अपच और रोगों के उपचार में फायदेमंद है। खिरनी खून को साफ करती है इसके अलावा सूजन, पेट दर्द और खाद्य तेल के रूप में किया जाता है।
करौंदा
करौंदा भूख बढ़ाता है, पित्त को शान्त करता है और वात विनाषक होता है। करौंदे का फल प्यास को रोकता है और दस्त को बन्द करता है। करौंदा के कच्चे फल भूख को बढ़ाते हैं, पके हुए फल रक्त एवं पित्त दोष के उपचार में उपयोगी हैं।
लसोड़ा
लसोड़े का फल प्यास को रोकता है। इसकी कोंपलों को खाने से मूत्र संबंधी जलन और कई प्रकार के अन्य रोग मिट जाते हैं। लसोड़े के उपयोग से पेट के कीड़े, दर्द, कफ, चेचक, फोड़ा आदि ठीक हो जाते हैं। यह पित्त दोष में बहुत ही उपयोगी है तथा बलगम व खून के दोषों को भी दूर करता है। इसके बीजों को पीसकर दाद-खाज और खुजली वाले अंगों पर लगाने से आराम मिलता है। लसोड़े की छाल के काढ़े को कपूर के साथ मिलाकर सूजन वाले हिस्सों में मालिष करने से फायदा होता है। इसकी छाल को पानी में उबालकर छान लें। इस पानी से गरारे करने से गले की खराष में फायदा होता है एवं आवाज खुल जाती है।
फलों का महत्व
भारत में जलवायु विविधता होने के कारण विभिन्न प्रकार के फल आसानी से उपलब्ध रहते हैं। उत्तर एवं पूर्वोत्तर राज्यों में शीतोष्ण फल जैसे कि सेब, अखरोट, आडु, खुबानी आदि प्रमुखता से उगाये जाते हैं। मैदानी भागों में उपोष्ण कटिबंधीय फल जैसे कि आम, अमरूद, लीची आदि प्रचुरता में पाए जाते हैं। दक्षिण के राज्यों में उष्ण कटिबंधीय फल जैसे कि कटहल, केला, अनन्नास, संतरा, आदि उपलब्ध रहते हैं। यद्यपि फल उत्पादन में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में से एक है, फिर भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती हुई आबादी की पोषण सुरक्षा मांग के अनुरूप आपूर्ति सुनिष्चित करने के लिए उत्पादन बढ़ावा अति आवश्यक है। इसके लिए यह जरूरी है कि फलों एवं उनसे होने वाले फायदों के विषय में उपलब्ध जानकारी जन-सामान्य तक पहुँच सके। इससे प्रेरणा लेकर नागरिक स्वयं ऐसी दोहरी रणनीति बनाएं कि आसपास में उपलब्ध फलदार पौधे काटे न जाएं एवं वर्तमान परिस्थिति में जलवायु अनुरूप यथासंभव नए फलदार पौधे लगाए जाएं। आज भी देश में प्रचलित फलों के साथ-साथ जंगली एवं कम उपयोग किए गए फल उपलब्ध हैं। इनमें प्रचुर मात्रा में पोषक के साथ-साथ औषधीय गुण भी पाए जाते हैं।
लेखिका, डॉ दीपाली चौहान, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र रायबरेली
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर