उत्तर प्रदेश में बंपर आलू उत्पादन के बावजूद किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। मंडियों में आलू के दाम 4–6 रुपये प्रति किलो तक गिर गए हैं, जो लागत से भी कम हैं। बीज, खाद, मजदूरी और कोल्ड स्टोरेज का खर्च निकालना मुश्किल हो गया है और कई किसानों को प्रति एकड़ 20–30 हजार रुपये का घाटा हो रहा है। ज्यादा सप्लाई और कमजोर मांग के चलते किसान परेशान हैं और सरकार से दाम सुधारने व प्रोसेसिंग जैसे उपायों की मांग कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में इस साल भी बंपर आलू उत्पादन का अनुमान है, लेकिन इसका फायदा किसानों को मिलता नजर नहीं आ रहा। मंडियों में आलू के दाम लागत से भी नीचे गिर चुके हैं। कई इलाकों में किसान अपना आलू खेत और मंडी में सिर्फ 4 से 6 रुपये प्रति किलो के भाव पर बेचने को मजबूर हैं, जबकि लागत इससे कहीं ज्यादा है।
किसानों का क्या कहना है?
कानपुर नगर के किसान अनिल कुमार बताते हैं कि एक एकड़ आलू की खेती में उन्हें करीब 70 से 75 हजार रुपये की लागत आई, जबकि बिक्री से सिर्फ करीब 50 हजार रुपये ही मिल पाए।अनिल कहते हैं कि लागत भी नहीं निकली और उन्हें करीब 25 से 30 हजार रुपये का सीधा नुकसान हो गया।

ऐसी ही स्थिति कन्नौज के किसान जागेश्वर प्रसाद की भी है। उन्होंने मंडी में 33 पैकेट आलू बेचे, जिनसे उन्हें सिर्फ 6 हजार रुपये मिले, जबकि लागत करीब 12 हजार रुपये थी।जागेश्वर बताते हैं कि उन्होंने करीब पाँच बीघा में आलू की खेती की थी, लेकिन मुनाफा तो दूर, लागत भी नहीं निकल पाई और उन्हें भारी घाटा झेलना पड़ा।
प्रति एकड़ 20 से 30 हजार रुपये तक का नुकसान
किसानों का कहना है कि बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और कोल्ड स्टोरेज पर हजारों रुपये खर्च करने के बाद भी उन्हें सही दाम नहीं मिल रहा। मौजूदा हालात में कई किसानों को प्रति एकड़ 20 से 30 हजार रुपये तक का नुकसान हो रहा है।

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बाजार में मांग कमजोर
दरअसल, नए आलू की आवक लगातार बढ़ रही है, जबकि बाजार में मांग कमजोर बनी हुई है। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य है। देश में पैदा होने वाला लगभग हर दूसरा आलू यूपी की मिट्टी से निकलता है, लेकिन यही बड़ी पैदावार इस समय किसानों के लिए परेशानी का कारण बन गई है।
आखिर आलू के दाम कब बढ़ेंगे ?
आगरा, फिरोजाबाद, कन्नौज, फर्रुखाबाद, इटावा, हाथरस, मैनपुरी, अलीगढ़, शाहजहांपुर, हरदोई और कानपुर बेल्ट में खुदाई शुरू होते ही किसान आलू निकालने से पीछे हटने लगे हैं। किसानों का सवाल है—आखिर आलू के दाम कब बढ़ेंगे और उन्हें उनकी मेहनत का सही मूल्य कब मिलेगा?

क्या प्रोसेसिंग से होगा सुधार?
इस मुद्दे पर कन्नौज के आलू व्यापारी मनोज राजपूत का कहना है कि किसानों को इस घाटे से बचाने के लिए सरकार को आगे आना होगा।उनका सुझाव है कि अगर आलू प्रोसेसिंग फैक्ट्रियां लगाई जाएं, जहां किसानों के आलू को इनपुट के तौर पर इस्तेमाल कर चिप्स, फ्रेंच फ्राइज या अन्य उत्पाद बनाए जाएं, तो इससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकता है।मतलब मौजूदा हालात साफ बताते हैं कि डिमांड और सप्लाई के असंतुलन का सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है।
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