पराली से सिर्फ पर्यावरण को नुकसान नहीं, खेत, पैसा, स्वास्थ्य सब बर्बाद हो रहा

पराली ना सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है, हमारे खेतों को भी बर्बाद कर रही है, उनकी उर्वरक क्षमता को कम कर रही है। सबसे ज्यादा पराली धान 43% फीसदी, गेहूं 21%  और गन्ने 19 % फसलों से निकलती है।

पराली ना सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है, हमारे खेतों को भी बर्बाद कर रही है, उनकी उर्वरक क्षमता को कम कर रही है। सबसे ज्यादा पराली धान 43% फीसदी, गेहूं 21%  और गन्ने 19 % फसलों से निकलती है।

अक्टूबर का महीना चल रहा है, और दिवाली करीब है। ये वही मौसम है, जिसमें हर दिल्ली-एनसीआर में धुंधला दिखते आसमान के बाद आम लोगों के साथ सरकारें भी सजग हो जाती हैं। गाड़ियों के ऑड-ईवन फॉर्मूले पर विचार होने लगता है, स्कूल कुछ दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। पटाखों पर प्रतिबंध लगाने को लेकर समाज दो धड़े में बंट जाता है, लेकिन इन सब के पीछे जो असल मुद्दा है पराली, उस पर ज्यादा बात नहीं हो पाती।

पराली ना सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है, हमारे खेतों को भी बर्बाद कर रही है, उनकी उर्वरक क्षमता को कम कर रही है। सबसे ज्यादा पराली धान 43% फीसदी, गेहूं 21%  और गन्ने 19 % फसलों से निकलती है। कृषि चक्र का एक स्याह पहलू है खेतों का अवशेष, जिसे किसान अगली फसल की तैयारी की जल्दी में खेत में ही आग के हवाले कर देते हैं। ये एक ऐसा मजबूरी में उठाया कदम है, जिसका असर चौतरफा होता है।

खेतों को नुकसान

आंकड़े बताते हैं कि, एक टन धान की पराली में लगभग 400 किलो कार्बन, 5.5 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस और 25 किलो पोटेशियम जैसे कीमती पोषक तत्व होते हैं। जब पराली जलाई जाती है, तो ये सभी तत्व धुएं में उड़ जाते हैं। नतीजतन, किसान को अगली फसल के लिए इन पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए महंगा रासायनिक खाद खरीदना पड़ता है। आग की गर्मी से मिट्टी का तापमान 35-42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है।

जानकारों की मानें तो आग की ये गर्मी जमीन के अंदर केंचुए और दूसरे करोड़ों सूक्ष्मजीवों को मार देती है, जो मिट्टी को उपजाऊ और भुरभुरा बनाने में बहुत मदद करते हैं। ये ‘मित्र कीट’ ही मिट्टी की असली ताकत हैं, इनके मरने से मिट्टी धीरे-धीरे बंजर होने लगती है। पराली मिट्टी के लिए जैविक कार्बन का सबसे अच्छा स्रोत है। इसे जलाने से मिट्टी की ऊपरी परत कठोर हो जाती है, जिससे उसकी पानी सोखने की क्षमता कम हो जाती है।

किसान की लागत बढ़ जाती है

पराली जलाना तात्कालिक रूप से भले ही किसानों को सस्ता लगे, लेकिन लंबे समय में ये किसानों और देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महंगा है। पोषक तत्व जलने से किसान को रासायनिक उर्वरकों पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है, जिससे उसकी खेती की लागत बढ़ जाती है। पराली के धुएं से होने वाली बीमारियों के इलाज पर लोगों और सरकार का करोड़ों रुपया खर्च होता है, जो देश के विकास में लग सकता था। जिसे किसान कचरा समझकर जला रहा है, वो वो बहुत कीमती है, बस किसान उसकी कीमत समझ नहीं पा रहा है।

पर्यावरण को कितना नुकसान?

पराली जलाने का सबसे पहला असर हमारे पर्यावरण पर पड़ता है। जब किसान खेतों में आग लगाते हैं, तो इससे बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4), और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (N2O) जैसी खतरनाक ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। ये गैसें वायुमंडल में जाकर ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाती हैं, जिससे मौसम का चक्र बिगड़ रहा है। इसके अलावा, इससे निकलने वाले बारीक कण हवा को जहरीला बना देते हैं। ये उत्तर भारत को एक गैस चैंबर में तब्दील कर देता है। आसमान में धुंध और स्मॉग की मोटी चादर छा जाती है, जिससे सूरज की रोशनी भी धरती तक ठीक से नहीं पहुंच पाती है। ये वायु प्रदूषण सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों के लिए भी घातक है।

इंसान की सेहत के लिए खतरनाक

पराली का धुआं हमारी सांसों में जहर घोलने का काम करता है। इसमें मौजूद हानिकारक कण और गैसें जब सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंचती हैं, तो ये कई गंभीर बीमारियों को जन्म देती हैं. अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का कैंसर और हृदय रोग जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं।

कैसे हो सकता है बेहतर इस्तेमाल?

पराली का इस्तेमाल बिजली बनाने, बायोगैस बनाने, कार्डबोर्ड बनाने, पशुओं का चारा तैयार करने और मशरूम की खेती जैसे कई कामों में हो सकता है, जो किसानों की Extra Income का जरिया बन सकती है।

वीडियो: धरती के बाद क्या बचेगा?

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