भारत-अमेरिका डील के बाद GM फसलों पर क्यों बढ़ी बहस?

भारत-अमेरिका डील

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के बाद GM (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलों को लेकर बहस तेज हो गई है। भारत ने कुछ अमेरिकी कृषि उत्पादों पर कम या शून्य शुल्क देने की सहमति दी है, लेकिन सरकार का कहना है कि संवेदनशील फसलों और किसानों के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं। किसान संगठनों और विपक्ष ने GM उत्पादों के “पिछले दरवाजे” से आने की आशंका जताई है, जबकि सरकार ने अपनी पुरानी GM नीति में कोई बदलाव न होने की बात कही है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के बाद एक बार फिर जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों को लेकर बहस तेज हो गई है। इस समझौते में भारत ने कुछ अमेरिकी कृषि और खाद्य उत्पादों पर शून्य या कम शुल्क देने की बात मानी है, लेकिन सरकार का कहना है कि संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।

इस समझौते में DDGS (पशु चारा), लाल ज्वार, सोयाबीन तेल और कुछ फल-मेवे जैसे उत्पादों पर ध्यान गया है, क्योंकि ये अमेरिका की उन सप्लाई चेन से जुड़े हैं, जहां ज्यादातर फसलें GM तकनीक से उगाई जाती हैं। इसी वजह से GM फसलों को लेकर चर्चा फिर शुरू हो गई है।

GM फसलें क्या होती हैं?
GM फसलें वे पौधे होते हैं जिनके डीएनए में आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी की मदद से बदलाव किया जाता है, ताकि उनमें कीट प्रतिरोध, खरपतवार सहनशीलता या मौसम के तनाव को झेलने जैसी खास खूबियां आ सकें।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध GM खाद्य पदार्थ सुरक्षा जांच से गुजर चुके हैं और आम तौर पर मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण नहीं माने जाते। हालांकि, हर देश अपने नियमों के अनुसार इनकी अलग-अलग जांच करता है।

GM बहस में अमेरिका क्यों अहम है?
अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े GM फसल उत्पादकों में से एक है। वहां 90 प्रतिशत से ज्यादा मक्का, कपास और सोयाबीन GM किस्मों से उगाए जाते हैं।इसी वजह से अमेरिका के ज्यादातर कृषि निर्यात—जैसे पशु चारा या प्रोसेस्ड उत्पाद—GM फसलों से जुड़े होते हैं।

व्यापार समझौते में क्या बदला?
सरकार के मुताबिक, भारत ने मक्का और सोयाबीन जैसे संवेदनशील उत्पादों के लिए बाजार नहीं खोला है।
लेकिन DDGS और सोयाबीन तेल जैसे कुछ उत्पादों पर कम या शून्य शुल्क देने की बात हुई है। विवाद इसलिए है क्योंकि DDGS आमतौर पर GM मक्का से बनता है।

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भारत GM उत्पादों के आयात से क्यों बचता है?
भारत का रुख पूरी तरह विरोध का नहीं है, बल्कि सावधानी और नियमों पर आधारित है।आपको बता दें कि भारत में अभी केवल Bt कपास (गैर-खाद्य फसल) की ही व्यावसायिक खेती की अनुमति है।कोई भी GM खाद्य फसल अभी पूरी तरह मंजूर नहीं है।नियमों के अनुसार, GM सामग्री वाले खाद्य उत्पादों पर लेबलिंग और जांच जरूरी है।
इसके पीछे कुछ कारण हैं जैसे छोटे किसानों की सुरक्षा मतलब सस्ते GM आयात से घरेलू कीमतें गिर सकती हैं। दूसरी पर्यावरण चिंता यानी जैव विविधता और मिट्टी पर लंबे समय के असर को लेकर आशंका। तीसरा ट्रेसबिलिटी की समस्या मतलब बड़े पैमाने पर आयात में यह तय करना मुश्किल होता है कि उत्पाद GM है या नहीं।

    किसानों और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
    कई किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने इस समझौते को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इससे GM उत्पाद “पिछले दरवाजे” से भारत में आ सकते हैं और किसानों को नुकसान हो सकता है।वहीं सरकार का कहना है कि समझौते से भारत की GM नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है और संवेदनशील फसलों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।

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