IRRI की स्टडी के मुताबिक, डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) पर सही निवेश से भारत में जलवायु-अनुकूल धान खेती को बढ़ावा मिल सकता है। यह तरीका कम पानी और कम मजदूरी में खेती संभव बनाता है। नई DSR-अनुकूल धान किस्मों ने परीक्षण में करीब 15% ज्यादा पैदावार दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे किसानों की लागत घटेगी, आय बढ़ेगी और पर्यावरण पर दबाव भी कम होगा।
अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI) की एक नई स्टडी में कहा गया है कि डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) यानी सीधे बोई जाने वाली धान की खेती पर सही तरीके से निवेश किया जाए, तो यह भारत में जलवायु-अनुकूल खेती का भविष्य बदल सकती है।
धान की खेती पर बढ़ता दबाव
भारत में धान की खेती आज कई चुनौतियों से जूझ रही है। पानी की कमी बढ़ रही है, खेतों में मजदूर महंगे होते जा रहे हैं और जलवायु परिवर्तन का असर भी साफ दिखने लगा है। परंपरागत तरीके से रोपाई वाली धान की खेती (TPR) में बहुत ज्यादा पानी और मेहनत लगती है। इसके मुकाबले DSR पद्धति कम पानी और कम मजदूरी में की जा सकती है, लेकिन अब तक इसका ज्यादा विस्तार नहीं हो पाया है।IRRI के वैज्ञानिकों का कहना है कि अब तक ज्यादातर लोकप्रिय धान की किस्में सीधे बोने (DSR) के लिए तैयार नहीं थीं। ऐसे में किसान हर साल इस तकनीक पर भरोसा नहीं कर पाते थे।
नई रिसर्च क्या कहती है?
IRRI ने भारतीय शोध संस्थानों के साथ मिलकर, और जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से, ऐसी धान की किस्मों पर काम किया है जो सीधे बोने पर भी तेजी से उगें, अच्छी बढ़त लें और स्थिर उत्पादन दें। कई मौसमों में किए गए फील्ड ट्रायल में पाया गया कि नई किस्मों ने DSR पद्धति में करीब 15% ज्यादा उत्पादन दिया, और रोपाई वाली खेती में भी अच्छा प्रदर्शन किया।
किसानों को क्या फायदा होगा?
बिज़नेस लाइन की एक रिपोर्ट के मुताबिक IRRI के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय प्रमुख वैज्ञानिक विकास के. सिंह का कहना है कि अगर लोकप्रिय धान की किस्मों को DSR के अनुकूल बना दिया जाए, तो किसान कम पानी और कम मजदूरी में ज्यादा पैदावार ले सकेंगे, वो भी बिना अपनी पसंदीदा किस्म बदले।
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जलवायु और पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद
वैज्ञानिकों का मानना है कि DSR को बढ़ावा देना भारत के अंतरराष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप है। इससे पानी की बचत होगी, खेती से होने वाला कार्बन उत्सर्जन घटेगा और टिकाऊ खेती को बढ़ावा मिलेगा। DBT के वैज्ञानिक संजय कालिया ने कहा कि “धान की खेती में पानी को अक्सर मुफ्त समझ लिया जाता है, लेकिन DSR इस सोच को बदलेगा। आने वाले समय में धान की खेती गेहूं की तरह की जा सकेगी।”
आने वाले समय की तैयारी
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर DSR के लिए तैयार नई किस्में बड़े पैमाने पर अपनाई जाती हैं, तो मध्य भारत के धान उत्पादक राज्यों में सिंचाई की जरूरत काफी कम हो सकती है, किसानों की आमदनी बढ़ेगी और पर्यावरण पर दबाव भी घटेगा। कई नई किस्में अब राष्ट्रीय स्तर की जांच प्रक्रिया में हैं, यानी जल्द ही किसान इनके फायदे खेतों में देख सकेंगे।
स्टडी कहती है कि DSR पर निवेश सिर्फ खेती की तकनीक नहीं, बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा और जलवायु-सुरक्षित भविष्य की दिशा में एक रणनीतिक कदम है।
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