सरकार तकनीक की मदद से खाद के सही इस्तेमाल पर काम कर रही है। एग्रीस्टैक के जरिए खेत, फसल और खाद को जोड़कर यह तय किया जा रहा है कि कितनी खाद की जरूरत है। पायलट प्रोजेक्ट से हरियाणा जैसे राज्यों में यूरिया और डीएपी की बड़ी बचत हुई है। ज्यादा यूरिया के नुकसान को देखते हुए सरकार जागरूकता अभियान और ‘धरती माता निगरानी समितियां’ चला रही है।
सरकार अब तकनीक की मदद से खेतों में खाद के सही इस्तेमाल पर काम कर रही है। केंद्रीय कृषि सचिव रजत कुमार मिश्रा ने बताया कि सरकार एग्रीस्टैक जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का पायलट प्रोजेक्ट चला रही है, जिसमें खेत की ज़मीन, कौन-सी फसल उगाई जा रही है और कितनी खाद इस्तेमाल हो रही है—इन तीनों को जोड़ा जा रहा है। इसका मकसद यह तय करना है कि किसी फसल को असल में कितनी खाद की जरूरत है।
यूरिया के इस्तेमाल पर सरकार के ठोस कदम
उन्होंने बताया कि चार राज्यों में सात पायलट चल रहे हैं, जहां अब तक करीब 60 प्रतिशत ज़मीन, फसल और खाद का मिलान हो चुका है। जब यह मिलान 80 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा, तब सरकार जरूरत से ज्यादा यूरिया के इस्तेमाल को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएगी।
हरियाणा में सफल प्रयोग
मिश्रा ने यह भी कहा कि खाद के ज्यादा इस्तेमाल को रोकने में बटाईदार किसानों (को-टेनेंट्स) को भी सिस्टम में शामिल किया जा रहा है, ताकि किसी तरह की परेशानी न हो। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में करीब 60 प्रतिशत खाद का इस्तेमाल ऐसे लोग करते हैं, जिनके नाम पर ज़मीन नहीं है।उन्होंने बताया कि हरियाणा में एग्रीस्टैक के जरिए किया गया एक प्रयोग काफी सफल रहा। वहां सिर्फ चार महीने में पिछले साल की तुलना में 1.02 लाख टन यूरिया और 72 हजार टन डीएपी की बचत हुई।
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देश के 163 ऐसे जिलों में शुरू हुआ जागरूकता अभियान
कृषि सचिव ने बताया कि 2024-25 में करीब 65 प्रतिशत किसान साल में 5 से 7 बोरी यूरिया खरीदते हैं, जो सामान्य माना जाता है। लेकिन बाकी 35 प्रतिशत किसान जरूरत से ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने कहा कि छोटे किसानों के पास सीमित साधन होते हैं, इसलिए वे बाजार में सबसे सस्ती खाद यानी यूरिया ही ज्यादा खरीदते हैं। इसके अलावा सरकार ने देश के 163 ऐसे जिलों में जागरूकता अभियान शुरू किया है, जहां खाद का इस्तेमाल बहुत ज्यादा है। इन जिलों में हर साल औसतन 2.2 करोड़ बोरी यूरिया खपत हो रही है। किसानों को भी यह समझ में आ रहा है कि इतना ज्यादा इस्तेमाल ठीक नहीं है।
‘धरती माता निगरानी समितियां’
सरकार ने किसानों को जागरूक करने के लिए ‘धरती माता निगरानी समितियां’ भी बनाई हैं। अब तक देशभर में करीब 1.56 लाख समितियां बनाई जा चुकी हैं, जो किसानों को ज्यादा खाद डालने से होने वाले नुकसान के बारे में बता रही हैं।
आपको बता दें कि नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर भारतीय अनुसंधान परिषद (ICRIER) की ओर से मिट्टी के स्वास्थ्य पर जारी एक नए शोध पत्र के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में कृषि और उर्वरक नीति से जुड़े नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद समेत कई बड़े नामों ने अपने विचार रखे। इसी दौरान केंद्रीय कृषि सचिव रजत कुमार मिश्रा ने भी अपनी यह बात रखी।
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